प्रांशुल त्रिपाठी, सतना
खिलौनों की तरह दिल को तोड़ने वालों
देखो मैं फिर से टूटे दिल को जोड़ कर आया हूँ ।
पता नहीं क्यों अब हमारी दिल लगाने की
किसी से हिम्मत नहीं होती
शायद मैं सारी हदों को पार कर आया हूँँ ।
जो कीमतें लगाते हो तुम खिलौनों की
क्या वही कीमतें लगाओगे हमारे इस टूटे दिल की ?
और जो जगह देते हो तुम खिलौनों को
वह जगह क्या दे दोगे हमारे इस टूटे दिल को ?
अगर कोई गलती रह गई होगी दिल को जोड़ने में
तो हमें बेहिचक माफ करना तुम ।
क्योंकि हमें तो टूटे खिलौने को भी जोड़ना आता नहीं ।
फिर भी हमने इस टूटे दिल को
जोड़ने की कोशिश की है ।
क्योंकि अभी भी तुमसे दूर जाया जाता नहीं ।
तुम्हें रोज एक नया दिल तोड़ने का
हुनर आता कहाँ से है ?
हमसे तो तुम्हारा एक ही चेहरा भुलाया जाता नहीं ।