जगन्नाथ शुक्ल ✍️ (प्रयागराज)

आँसू वाले झरने से तन भीग रहा, मन सूख रहा;
घाव हृदय के भरने को फिर कोई युक्ति सुझाओ ना।
मन के आँगन में सावन,
पतझड़ जैसा बर्ताव करे।
रह- रह के चलती पछुआ,
करती रहती है घाव हरे।।
नित उर के अम्बर में मेरे दुःख की बदली छाई रहती;
चिर बिजली को जला-जला अंदर की टीस बढ़ाओ ना।
घाव हृदय………………………..
प्यास बुझाने के दिन में ,
धरती बंजर ही छोड़ गये।
फूल सदृश मृदु उर मेरा –
क्यों सदा-सदा को तोड़ गये?
जहाँ चमेली का शासन था आज खार हैं भरे पड़े;
दुःख के पत्थर काट-काट उर्वर कर प्रेम उगाओ ना।
घाव हृदय…………………………
जहाँ उमड़ते नेह-ज्वार ने,
पोर-पोर अभिसार किया।
वहाँ एक तितली ने आ कर,
हृदय तोड़ व्यापार किया।
प्रेम-पंथ से तोड़ के नाता ,प्रेम-ग्रन्थ नित बाँच रहे;
ऐसे दो-राही मन को,एकनिष्ठ मार्ग दिखलाओ ना।
घाव हृदय………………………..