हाँ प्रेममय हो जाऊं मैं

ज़ैतून ज़िया :

मेरा नाम शीर्षक में
लेकिन तुम्हारे नाम के बिना गुमनाम
इस शीर्षक को जानते है सब
तुम्हारे नाम से
जब तक तुम्हें ना लिखा जाये
हाँ वहीं नीचे कोने में
शीर्षक पढ़ के भी
पढता नहीं कोई

तुम्हें रुकना नहीं है
तुम्हें सड़ना नहीं है
तुम्हें समुद्र में भी नहीं मिलना
तुम्हें बहना है सतत
पहाड़ों से होते हुए
घाटियों में
मैदानों में
और रेगिस्तान में
तुम्हें मिलना नहीं है समुद्र में
तुम्हें तो बसानी है घाटियां
तुम्हें बसाने है मैदान और रेगिस्तान !!!

सुनो
मत रुको तुम मेरे किनारे
मै पहाड़ हूँ
पत्थर हूँ
निर्मम हूँ
जंगल हूँ
तुम बहो मुझसे हर बार
इस तरह
कि मुझे खुद में मिला लो
मुझे पहाड़ से
रेत कर दो
मुझे ले जाओ अपने साथ
बिछा दो घाटियों में
मैदानों में
मेरा अस्तित्व पहाड़ ना रहे
प्रेम उपजे मुझमे
भूक मिटे मुझसे
उर्वर हो जाउं मै बंजर से
तुम्हारे अस्तित्व में मिल जाउं मै
हाँ प्रेममय हो जाउं मै !!!
                              
                                           ©ज़ैतून ज़िया