● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हम जब जड़-चेतन/स्थावर-जंगम पर ‘नख-शिख’ (नीचे से ऊपर तक) दृष्टि-निक्षेपण/दृष्टिपात करते हैं तब हमे विकृति (विकार) दिखती है और सुकृति (सुकार) भी। यह द्रष्टा का अधिकारक्षेत्र होता है कि वह प्रथमत: (सर्वप्रथम) ‘निन्दा’ करे वा (अथवा) ‘स्तुति’ करे। यदि वह आलोचक स्वस्थ मन-मस्तिष्क धारण करता है तो अपनी सम्यक् दृष्टि का परिचय प्रस्तुत करते हुए, (यहाँ ‘देते हुए’ का प्रयोग अशुद्ध है।) उतने ही अवगुण (‘अवगुणों’ अशुद्ध है।) पर दृष्टिपात करता है, जितने वस्तुत: होते हैं; वह पृथक् रूप से उसमे अवगुण का आरोपण नहीं करता और उसकी गुणधर्मिता जितनी लक्षित हो रही होती है, उसी का निरूपण भी करता है; वह किसी अतिशयोक्तिपूर्ण चिन्तन का आश्रय नहीं लेता।
आलोचना का प्रभाव हर किसी पर पड़ता है; कोई प्रतिक्रिया करता है; कोई आत्मग्लानि से भर जाता है; कोई आलोचक के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने के लिए तत्पर हो जाता है तो कोई अपना रास्ता ही अलग कर लेता है।
प्रश्न है, कितने पढ़े-लिखे लोग ‘आलोचना के चरित्र’ से अवगत हैं और अपने व्यावहारिक जगत् मे उसका युक्तियुक्त संदर्भ ग्रहण करते हैं? सत्य कटु होता है; तीक्ष्ण होता है तथा मधुर भी। यही आलोचना-मर्म है और आलोचना-निष्पत्ति भी।
जो भी विद्यार्थी, अध्यापक-अध्यापिकाएँ, लेखक, कवि, साहित्यकार, समीक्षक आलोचना की अवधारणा से अनभिज्ञ रहकर, उसकी प्रस्तुति ‘निन्दा’ के रूप मे करते हैं, उन सभी को स्वस्थ ‘वार्त्तिक’ (किसी ग्रन्थ की आलोचनात्मक टीका) का अनुशीलन करना चाहिए। धरातलीय अध्ययन कर, आलोचनात्मक पक्ष का संज्ञान
करना (‘संज्ञान लेना’ का प्रयोग अशुद्ध है।) पापबुद्धि का लक्षण है।
हमारे देश की शिक्षा, परीक्षा, परिणाम तथा नियोजन-पद्धतियाँ इतनी विकृत कर दी गयी हैं कि ‘प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार’ पर योग्यता प्रतिपादित नहीं होती; पुष्ट नहीं होती। यही कारण है कि सर्वत्र असमाधान की हवा (‘हवाएँ’ अशुद्ध है।) चल रही है। (यहाँ ‘बह रही है’ का प्रयोग अशुद्ध है; क्योंकि ‘जल’ बहता है और ‘हवा’ चलती है।)
एक स्वस्थ और समृद्ध आलोचक निर्भीक होकर अपने पथ पर चलता रहता है और ‘अयोग्य, असमर्थ, अशक्त तथा अन्यथागामी बुद्धिजीवी’ वाचाल की भूमिका मे दिखते रहते हैं; अन्तत:, भौंक-भौंककर इतने कृषकाय (दुर्बल) हो जाते हैं कि श्रान्त (क्लान्त) होकर रह जाते हैं; थक जाते हैं। जैसे गजराज वक्षप्रान्त उन्नत किये अपने गन्तव्य की ओर गतिमान् रहता है; परन्तु न जाने क्यों ‘आवारा’ और ‘पालतू’ कुत्ते उसे देखते ही ‘भौं-भौं’ करने लगते हैं, फिर थक-हारकर एक किनारे हँफाई मारते हुए, सुस्ताने लगते हैं।
तो आइए! आलोचनाधर्म के साथ सम्पृक्त हों; सम्बद्ध हों।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)