आलोचनाधर्म-मर्म तथा कर्म की अवधारणा
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हम जब जड़-चेतन/स्थावर-जंगम पर ‘नख-शिख’ (नीचे से ऊपर तक) दृष्टि-निक्षेपण/दृष्टिपात करते हैं तब हमे विकृति (विकार) दिखती है और सुकृति (सुकार) भी। यह द्रष्टा का अधिकारक्षेत्र होता है कि वह […]