प्रेम शब्द बड़ा व्यापक है। मीराबाई कृष्णभक्त थी। मीरा प्रेम दीवानी हो गई। कृष्ण भजन में लीन हो गई। प्रेम परमात्मा से करना चाहिए। प्रेम में विश्वास हो श्रद्धा हो समर्पण हो तभी प्रेम सच्चा कहलाता है। निष्काम भाव से उस परमात्मा से प्रेम करो। लौकिक प्रेम तो देह का प्रेम है। स्वार्थ के पूर्ण करने के लिए लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं। स्वार्थ पूर्ण होते ही नफरत घृणा करने लगते हैं। ये सांसारिक प्रेम की सच्चाई है। पायो जी मैंने राम रतन धन पायो, वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु किरपा कर दरसायो। इसलिए सच्चा धन सच्चा रत्न क्या है। वह परमात्मा जो प्रेम से पाया जाता है।
प्रेमगली अति सांकरी जा मे दो न समाय। इसलिए ह्रदय देश मे किसी एक छवि को बसाओ । वहाँ दो का प्रवेश नहीं यानि वह ईश्वर एक है। अतः हमें प्रेम से सुमिरण करना चाहिए। यही तपस्या है। ईश्वर तप से जप से प्रेम से भक्ति से भजन से पाया जाता है। घोर तप करने वाले शरीर को कष्ट देते है। गिरी कन्दराओं में तप करते हैं। कंद मूल फल खाते हैं। ये तप करने की अलग अलग विधियां। ऐसे तपस्वी परमात्मा को प्रसन्न करते हैं। सच्चे तपस्वी वो होते हैं जो किसी कामना से तप नहीं करते।
निष्काम प्रेम से भक्ति करने वाले ही सच्चे तपस्वी होते हैं।
प्रेम से बोलोगे तो आपके दो काम ज्यादा होंगे। कौए की तरह बोलेंगे न तो कोई नजदीक नहीं आएगा। प्रेम वश भगवान। शबरी ने प्रेम से भगवान श्रीराम को झूंठे बैर खिलाये तो भगवान ने खाये। प्रेम से विदुर ने कृष्ण को भोजन कराया भगवान ने ग्रहण किया। इसलिए प्रेम से भाव से उत्तम विचार से जीवन मे आगे बढ़ो।
प्यार ढाई आखर का शब्द है। ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय। प्रेम से भाईचारे से रहना चाहिए यह हम पढ़ते आये हैं लेकिन हम देखते हैं विश्व मे कितनी हिंसा आतंकवाद की घटनाएं रोज होती हैं। शांति वार्ता सभी करते हैं लेकिन शांति स्थापित नही होती। प्यार से रहना सीखो। किसी से नफरत मत करो। बुराइयों से नफरत करो केवल फिर देखो आपका जीवन आनंदमय हो जाएगा।
डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
कवि, साहित्यकार
भवानीमंडी