हृदय के विकास का परिणाम है प्रेम

प्रेम जब भी होता है एकतरफा ही होता है।
दूसरों से अपने लिए प्रेम की आशा केवल मूर्ख को होती है बुद्धिमान को नहीं।

प्रेम तो हृदय के विकास का परिणाम है। मांगने या देने की वस्तु नहीं बल्कि यह तो अनुभूति का मामला है।

प्रेम के चार प्रमुख लक्षण हैं-
संवेदना, सत्साहस, सतश्रद्धा, सद्वृत्ति।
इन चारों लक्षणों से युक्त सिद्ध होने पर ही मनुष्य प्रेमपूर्ण माना जाता है।

भावनात्मक विकास दो प्रकार का हो सकता है- सद्भाव और दुर्भाव।
ये संवेदना, सत्साहस, सतश्रद्धा, सद्वृत्ति को ही सद्भाव कहते हैं।

सद्भाव ही प्रेम है।
दुर्भाव ही घृणा है।।

जड़ता, दुस्साहस, दुश्श्रद्धा, दुर्वृत्ति को ही दुर्भाव कहते हैं।

किसी से लगाव ही सद्भाव है, प्रेम है।
किसी से दुराव ही दुर्भाव है घृणा है।

दार्शनिक सत्य केवल इतना है कि इस दृश्यमान दुनिया में दूसरा कोई नहीं है।
मैं-तू के बीच द्वैत मिथ्या है।
और तदनुसार सत्यात्मक सनातन धर्म केवल इतना है कि तुम दूसरों को उनकी वर्तमान विकासदशा के अनुरूप ही स्वीकार करो, धारण करो।
दूसरों को यथावत् धारण करते ही तुम धार्मिक अर्थात प्रेमपूर्ण हो जाओगे।
दूसरों का विरोध ही अधर्म है, घृणा है।
परद्रोही ही अधर्मी है।

राम गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार