सर्वस्व समर्पित हुए बिना किसी का प्रेम पूर्ण नहीं होता।
जब तन मन प्राण आत्मा से पूर्णतः समर्पित होकर मनुष्य अपने इष्ट में स्थित होता है तभी वह अपने स्वाभिमान से मुक्त होकर इष्ट ही हो जाता है।
भक्ति जब बढ़ते हुए पूर्ण समर्पण तक जा पहुचती है तभी भगवत्ता प्राप्त होती है।
भक्त पूर्णतः समर्पित हुए बिना भगवान् तक नहीं पहुचता।
मनुष्य का अहंकार या स्वाभिमान ही उसकी पूर्णता में बाधक है।
प्रेम ही इस बाधा को दूर करने में समर्थ है।
प्रेम ही दूसरे को स्वीकार करने योग्य बनाता है।
प्रेम के बिना मनुष्य का हृदय बहुत कठोर होता है।
कठोर हृदय कभी दूसरे को स्वीकार नहीं कर पाता।
कठोर हृदय कभी दूसरे के प्रति झुकने नहीं देता।
इसीलिए कठोर हृदय का मनुष्य कभी अनुशासित नहीं बन पाता।
उसका स्वाभिमान उसे दुर्योधन की भाँति अनुशासनहीन और उद्दण्ड बना देता है।
सत्ज्ञान को सत्कर्म द्वारा सद्गुण में रूपांतरित करने पर ही हृदय में सद्भाव का उदय होता है।
यह सद्भाव ही प्रेम कहलाता है।
जो मनुष्य को संवेदनशील बनाता है।
सरलता, विनम्रता, उदारता, दयालुता, सेवापरायणता को ही संवेदनशीलता का लक्षण कहा जाता है।
संवेदनशीलता ही प्रेम का प्रथम चरण है।
दूसरों की वेदना या पीड़ा जितनी अधिक अनुभव होती है, मनुष्य उतना ही संवेदनशील कहलाता है।
प्रेम अद्भुत है।
प्रेम ही EQ है।
इमोशनल कोशंट ही EQ है।
यह EQ ही हृदय के विकास का फल है।
इसे मनुष्यों का भावनात्मक विकास कहते हैं।
✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)