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‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, प्रयाग की ओर से भारतरत्न पुरुषोत्तमदास टण्डन की १३९वीं जन्मतिथि पर आयोजित सारस्वत कार्यक्रम सम्पन्न

राजभाषा और राजलिपि राजर्षि टण्डन की देन– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

★ प्रस्तोता– राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’
(प्रधान सम्पादक– ‘अवध रहस्य’, लखनऊ।)

आज (१ अगस्त) ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ प्रयागराज के तत्त्वावधान में सम्मेलन के प्रचार-विभाग में राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन की १३९वीं जन्मतिथि के अवसर पर एक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया। समारोह में अध्यक्ष ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, प्रयागराज के प्रधानमन्त्री श्री विभूति मिश्र थे, जबकि विश्रुत भाषाशास्त्री और आलोचक आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने मुख्य आतिथ्य ग्रहण किया था। संयोजक की भूमिका का निर्वहण करते हुए, इस सारस्वत आयोजन की रूप-रेखा ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज के प्रबन्धमन्त्री श्री कुन्तक मिश्र ने तैयार की थी।
समारोह के मुख्य अतिथि भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने अपना मत प्रकट किया, “वास्तव में, टण्डन जी एक एक ऐसे सन्त पुरुष थे, जो पुरुषार्थ के धनी थे। वे एक ऐसे मनस्वी थे, जो भौतिकता से परे थे और अपने लक्ष्यसंधान के प्रति कटिबद्ध थे। उन्होंने देवनागरी लिपि और हिन्दीभाषा को संविधानसभा में महात्मा गांधी की ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा का प्रबल विरोध करते हुए, बहुमत के साथ क्रमश: ‘राजलिपि’ और ‘राजभाषा’ को मान्यता दिलायी थी। १९४९ ई० में ‘संविधानसभा’ में राजभाषा और राजलिपि के प्रश्न पर महात्मा गांधी की ‘हिन्दुस्तानी’ के पक्ष में कुल ३२ मत पड़े थे, जबकि ‘हिन्दी’ के पक्ष में ६२ मत। दोनों पक्षों की ओर से प्रखरता के साथ तथ्य और तर्क प्रस्तुत किये गये थे; अन्तत:, हमें हमारी मातृलिपि और मातृभाषा को ‘राज’ के साथ सम्बद्ध किया गया। यहीं से गांधी जी के साथ टण्डन जी का जो मतभेद दिख रहा था, वह मनभेद तक पहुँच गया। इतना ही नहीं, ‘वन्दे मातरम्’ को ‘राष्ट्रगीत’ को मान्यता दिलाने में ‘भारतरत्न’ टण्डन जी की महती भूमिका रही।

चित्र-विवरण– सम्मेलन-समारोह में प्रख्यात भाषाविद् और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मुख्य अतिथि के रूप में व्याख्यान करते हुए; मध्य में बैठे हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री और समारोह-अध्यक्ष श्री विभूति मिश्र तथा पार्श्व में बैठे हुए सम्मेलन के प्रबन्धमन्त्री और समारोह-संयोजक-संचालक श्री कुन्तक मिश्र।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने अपने उद्बोधन को गति देते हुए बताया, ”पुरुषोत्तमदास टण्डन की तेजस्विता और मनस्विता को भाँपते हुए सन्त देवरहा बाबा ने १५ अप्रैल, १९४८ ई० को सरयू नदी के तट पर आयोजित एक सारस्वत समारोह में वैदिक मन्त्रोचार के मध्य उन्हें ‘राजर्षि’ की उपाधि प्रदान की थी। हम सभी के लिए गौरव का विषय है कि ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, प्रयाग के प्रथम सभापति और प्रधानमन्त्री इलाहाबाद के ही रहे हैं। प्रथम सभापति महामना मदनमोहन मालवीय थे, जिन्होंने काशी में १० अक्तूबर, १९१० ई० को आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन में पुरुषोत्तमदास टण्डन को सम्मेलन का प्रथम प्रधानमन्त्री बनाया था, जिनके नेतृत्व में देवनागरी लिपि और हिन्दी को प्रभावमयी गति मिली थी। उन्होंने देश के कई राज्यों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से सम्मेलन की शाखा-प्रशाखाओं की स्थापना कर हिन्दी को विकास के पथ पर अग्रसर किया था। ऐसे क्रान्ति-पुरुष के ऐतिहासिक कर्तृत्व के प्रति मैं नमित हूँ।”

समारोह की अध्यक्षता कर रहे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, प्रयाग के प्रधानमन्त्री श्री विभूति मिश्र ने कहा, “आज हम जैसे हैं; जो कुछ भी हैं, वह टण्डन जी-जैसे हिन्दी के शिखर पुरुष की देन है। उनके त्याग और तपस्या का ही परिणाम है कि यह सम्मेलन हिन्दी के प्रचार-प्रसार में यथाशक्य लगा हुआ है। इस कक्ष में सम्मेलन के प्रथम सभापति महामना मदनमोहन मालवीय और प्रथम प्रधानमन्त्री राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन के चित्र लगे हुए हैं, जो हमें इस बात की प्रेरणा दे रहे हैं कि अपनी लिपि और भाषा के उन्नयन के प्रति कटिबद्ध रहो। आप सभी का दायित्व बनता है कि इस सम्मेलन की गरिमा और गौरव में वृद्धि करने के लिए, जनसामान्य और बौद्धिक वर्ग को सम्मेलन की गतिविधियों के साथ जोड़ें। इससे आपका सामाजिक सम्मान होगा और सम्मेलन-द्वारा हिन्दी के लिए किये जा रहे प्रचार-प्रसार को भी गति मिलेगी।”

समारोह के संयोजक- संचालक तथा ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, प्रयागराज के प्रबन्धमन्त्री श्री कुन्तक मिश्र ने व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा, “टण्डन जी-विषयक जयन्ती हमारे लिए, राष्ट्र के लिए तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन के लिए कई कारणों से गौरवपूर्ण है। वे ‘भारतरत्न’ थे; हमारे सम्मेलन के संस्थापकों में से एक थे तथा सम्मेलन के प्रथम प्रधानमन्त्री थे तथा हमारे इलाहाबाद के थे।”

श्री कुन्तक मिश्र ने अपने मत का विस्तार करते हुए कहा, “हम जब भी किसी महापुरुष की जयन्ती का आयोजन करते हैं, तब उसका अर्थ यह है कि उसके विचार, क्रियाकलाप अथवा जिस भी प्रकार का सोच रहा हो, उसे पहली जयन्ती से दूसरी जयन्ती तक धारण करें। टण्डन जी की अनेक संकल्पनाएँ कभी मूर्त रूप नहीं ले सकी हैं। हमें उन्हें पूरा करने के लिए लगना होगा। संस्था के लोग संस्था को बिगाड़ते हुए भी देखे जाते हैं। ऐसे लोग को चाहिए कि वे सकारात्मक सोच से संस्था के लिए काम करें, तभी संस्था के उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है।

इस अवसर पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यालय अधीक्षक श्री राजकुमार शर्मा, कोषाध्यक्ष श्री आनन्द पौराणिक, रजिस्ट्रार श्री अंजनी कुमार शुक्ल, श्री किण्ठमणि मिश्र, श्री दुर्गानन्द शर्मा, श्री प्रदीप श्रीवास्तव, श्री सौरभ पाण्डेय मुख्य रूप से उपस्थित थे।

अन्त में, संयोजक श्री कुन्तक मिश्र ने अभ्यागतगण के प्रति आभार-ज्ञापन किया।