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महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का स्मरण ‘हम’ वाराणसी में करेंगे : डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय

राहुल जी की तिब्बत-यात्रा सर्वाधिक साहसिक और अद्भुत खोजपूर्ण थी। वे भूमिगत होकर नेपाल के मार्ग पहली बार तिब्बत की राजधानी ल्हासा पहुँचे थे। उन्हें तो तत्कालीन अँगरेज़ सरकार ने यात्रा करने की अनुमति ही नहीं दी थी; परन्तु प्राण हथेली पर रखकर वे ऐसे दुर्गम मार्गों पर वेश बदलकर ज्ञान की खोज में निकल पड़े थे, जिन पर मनुष्य के चरणचिह्न कभी पड़े ही नहीं थे। यह उनके अदम्य इच्छाशक्ति और अद्भुत साहस का परिचायक है। संस्कृत और पालि के उन अनेक बौद्ध-ग्रन्थों को सार्वजनिक करने का श्रेय राहुल जी को ही जाता है, जो हज़ारों वर्ष-पूर्व लुप्त हो गये थे। उस यायावर पण्डित ने धर्मकीर्ति, प्रज्ञाकर गुप्त, ज्ञानश्री, असंग, वसुबन्धु, रत्नाकर, शान्तिरक्षित आदिक विद्वज्जन के यश को अमर कर दिया है।

संयोगवश, ९ अप्रैल महापण्डित राहुल जी की एक सौ छब्बीसवीं जन्मतिथि है और वाराणसी में आयोजित एक समारोह में ‘हिन्दी-भाषा और साहित्य के विकास में महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का योगदान’ विषय पर मत व्यक्त करने के लिए निमन्त्रित भी किया गया है। निस्सन्देह, उस समारोह में आमन्त्रित विदुषी-विद्वज्जन महापण्डित राहुल के अन्वेषणात्मक दृष्टि-बोध को आलोकित करेंगे, आशा की जा सकती है।