अतीक और अशरफ़ की हत्या पर उठते सवालात (?)

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

भारतीय इतिहास का एकमात्र उदाहरण, जिसमे देश के जाने-माने दो दुर्दान्त अपराधियों की पुलिस-संरक्षण मे हत्या कर दी गयी। दोनो अपराधियों को छ: पुलिसकर्मियों के घेरे मे मेडिकल-जाँच के लिए काल्विन अस्पताल मे लाया जा रहा था। जैसे ही अतीक ने किसी मीडियाकर्मी के प्रश्न का उत्तर देते समय कहना शुरू किया, “मेन बात है कि गुड्डू मुसलिम…”, उसी समय दोनो पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दी गयी थीं और उसे अपने घेरे मे लेकर चल रहे छ: पुलिसकर्मी मौन बने रहे?..!

१५ अप्रैल को एक ओर, एक दुर्दान्त अपराधी के हत्यारे बेटे का शव सिपुर्दे ख़ाक किया गया था; दूजे ओर, उसके कुछ घण्टे-बाद ही रात्रि मे १० बजकर ३३ मिनट १० सेकण्ड पर दो अपराधी भाइयों की पुलिस-हिरासत मे हत्या कर दी गयी थी। इस तरह से ४०-५० वर्षों से व्याप्त एक नृशंस अपराधी का आतंकी जीवन का १० सेकण्ड के भीतर अन्त हो गया था। बेशक, ऐसे आतंकियों ने इतने प्रकार के दुष्कृत्य किये थे, जो किसी भी तरह से उनके जीने के हक़ को छीन रहे थे; परन्तु यदि दोनो की मृत्यु न्यायिक प्रक्रियान्तर्गत हुई रहती तो देश की जनता का क़ानून पर विश्वास अटूट दिखता।

भले एक विशेष प्रकार की भीड़ ‘जय श्री राम’ का उन्मादी घोष करे फिर भी इतना निश्चित हो चुका है कि उत्तरप्रदेश-पुलिस ने अपने कारनामो से आज देश की जनता के मन-मस्तिष्क मे दहशत और ख़ौफ़ भर दिया है। पुलिस की मौजूदगी मे तड़ातड़ गोलियाँ चलती रहीं और पुलिस मूकदर्शक बनी रही? आस-पास मीडियाकर्मियों की भीड़ थी; उनकी भी हत्या की जा सकती थी। चूँकि घटना का एक-एक पल वहाँ पहुँचे लगभग १० मीडियाकर्मियों ने अपने-अपने कैमरे मे क़ैद कर लिये हैं इसलिए क़ैद किये गये पलों के विरुद्ध सरकारी उपक्रम सफल नहीं हो सकते।

बेशक, दुर्दान्त अपराधियों को कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए; लेकिन क़ानूनी प्रक्रियान्तर्गत। यदि प्रकारान्तर से अतीक और अशरफ़ की हत्या करानी ही थी तो न्यायालयों मे ले जाने-ले आने की ज़रूरत ही क्या थी? मुख्यमन्त्री आदित्यनाथ योगी के शासनकाल मे अब तक हज़ारों की संख्या मे पुलिस ने ‘एन्काउण्टर’ किये हैं, जिनमे से अधिकतर को ‘छद्म एन्काउण्टर’ क़रार दिया गया है।

जिस तरह से पिछले कुछ दिनों से हम साबरमती से प्रयागराज, प्रयागराज से साबरमती, बरेली से प्रयागराज और प्रयागराज से बरेली तथा अन्य सड़क मार्गों पर दहशतभरा ‘पुलिसिया रैली’ देखते आ रहे थे, उसमे कितनी ज़बरदस्त सुरक्षा बरती जा रही थी, उसे हम देख चुके थे।

काल्विन अस्पताल, प्रयागराज मुस्लिम-बहुल सघन क्षेत्र है और अत्यन्त व्यस्त गमनागमन-मार्ग भी। वहाँ ‘मेडिकल परीक्षण’ के लिए एक साथ लाये गये अतीक और अशरफ़ को पुलिस-अभिरक्षण/हिरासत मे ‘मेडिकल-जाँच’ कराने के लिए ले जाते समय पत्रकारों के प्रश्नो के उत्तर देते समय दोनो की नज़्दीक से मीडियाकर्मी की पूरी भूमिका मे आये तीन पेशेवर शूटरों का समीप से गोली चलाना तथा उसके बाद उन पर तब तक १८ से २२ गोलियाँ चलाते रहना जब तक यह निश्चित हो जाना कि दोनो की मृत्यु हो चुकी है और उसके बाद बहुत सहजता के साथ तीनो हत्यारों का “सरेण्डर-सरेण्डर” कहकर आत्मसमर्पण करना और एक हत्यारे का ज़मीन पर समर्पण-भाव मे लेट जाना― ये सभी घटनाक्रम चीख़-चीख़कर कह रहे हैं कि दाल मे काला ही नहीं है, बल्कि पूरी दाल ही काली है। ए० एन० आइ०, लखनऊ का एक मीडियाकर्मी शैलेश और एक पुलिसकर्मी मान सिंह भगदड़ मे घायल हुए हैं। सच और वास्तविकता तभी सामने आयेगी, जब मुख्यमन्त्री के आदेश पर गठित की जानेवाली जाँच-समिति पारदर्शिता के साथ जाँच-पड़ताल कर, अन्तिम निष्कर्ष पर पहुँचेगी।

हत्यारे जब गोलियाँ चला रहे थे और ‘जय-जय श्री राम’ के नारे लगा रहे थे तब उस ‘फ्रेम’ के आस-पास भी कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था। ऐसे मे, ‘पुलिस-अभिरक्षण’ मिथ्या साबित हो रहा है। क्या उस समय तैनात १७ सुरक्षाकर्मी हथियारविहीन थे? निश्चित रूप से इस प्रकरण मे उत्तरप्रदेश-पुलिस और अन्य सुरक्षाकर्मी पूरी तरह से ‘विफल’ सिद्ध हो चुके हैं।

हम यदि इस आद्यन्त घटनाक्रम का अध्ययन करते हैं तो ज्ञात होता है कि अतीक के आस-पास मीडियाकर्मियों के कैमरे होते थे, इसलिए उनकी उपस्थिति मे तो अतीक और अशरफ़ का एन्काउण्टर करना मुनासिब नहीं समझा गया था। यही कारण है कि हत्यारे कैमरे और माइक्रोफ़ोन के साथ ‘मीडियाकर्मी’ की भूमिका मे आये थे और अपना मक़्सद पूरा कर ‘आत्मसमर्पण’ कर दिये थे।

अब उत्तरप्रदेश के जितने भी तथाकथित सरकारी नेता हैं, उनके बयानात सुनने से यही लग रहा है कि वे सभी इस घटना के घटने से पहले ही समझ चुके थे कि उक्त प्रकार की घटना होगी ही।

इस प्रकार की अप्रत्याशित घटना पर सवालात के बौछार होंगे ही।

सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं― अतीक-अशरफ़ को ‘वज्रवाहन’ मे न लाकर, एक असुरक्षित सामान्य जीप मे बैठाकर क्यों लाया गया था? अतीक-अशरफ़ को जीप से उतारकर पुलिसकर्मी का ज़बरदस्त घेरा ‘सामान्य-सा घेरा’ क्यों दिख रहा था? पुलिसकर्मियों ने अतीक और अशरफ़ को मीडियाकर्मियों के साथ-साथ क्यों चलने दिया था?१७ पुलिसकर्मियों की उपस्थिति मे घटना कैसे घट गयी? हत्यारे― सनी, अरुण तथा लवलेश हथियार लेकर वहाँ कैसे पहुँच गये थे? एक-के-बाद-एक १८ से २२ गोलियाँ चलायी जाती रहीं और उस समय एक भी पुलिसकर्मी नहीं दिखा; यह कैसा पुलिस-संरक्षण? कहीं ऐसा तो नहीं, अतीक कोई चौंकानेवाला बयान करना चाहता था, जिसके लपेट मे सफ़ेदपोश, पुलिस-अधिकारी, राजनेता आदिक नज़र आते? अतीक-द्वारा १५ अप्रैल को पुलिस-अधिकारियों को धमकीभरी चेतावनी देना मौत का कारण तो नहीं बना?

सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)

◆ अतीक और अशरफ़ की अन्तिम पत्रकार-वार्त्ता, जो हत्या का कारण बनी।