कहानी : भरोसे की डोर

अनिल और राज नगवा गाँव की मिट्टी में एक साथ ही घिसलकर बड़े हुए थे। दोनो मे गहरी दोस्ती थी। बचपन से एक ही थाली में खाते और सोते भी एक ही छत के नीचे । गाँव के बीच खड़े पीपल की छाया ही दोनों का ठिकाना था। अनिल सीधा-सादा था और उसकी आँखों में सच्चाई झलकती थी पर राज चंचल, बातों का धनी। लोग कहते “इनकी दोस्ती में कभी दरार तो आ ही नहीँ सकती।”

अनिल को राज पर आँख बंद करके भरोसा था। वह जब भी परेशानी मे होता, राज का हाथ अपने आप बढ़ जाता। राज कहता “तू घबरा मत दोस्त, मैं हूँ ना ।”

समय बीतता गया। गाँव में प्रधानी का चुनाव आया। अनिल चुनाव लड़ना चाहता था। उसके इरादे नेक और साफ थे – गाँव की नाली, स्कूल, सड़क सब ऐसे बनाने हैँ कि मेरा गाँव एक उदाहरण बने। रात-रात भर जागकर वह राज के साथ योजनाएँ बनाता। वह राज से कहता “देख, पहले बूढ़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद मिले और फिर नौजवानों का जोश साथ हो तो जीत पक्की है।”

राज सिर हिलाता और प्रत्येक बिन्दु पर गम्भीरता से विचार करता। उधर गाँव का प्रभावशाली व्यक्ति सन्तोष भी चुनाव लड़ रहा था। वह किसी भी तरीके से अनिल को चुनाव हराकर जीतना चाहता था। सन्तोष ने एक तरकीब सोची और रात के समय राज को बुलावा भेजा। राज जब सन्तोष के पास पहुँचा तो उसने राज के सामने मेज पर 5 लाख के नोट डाल दिए। सन्तोष ने कहा कि घुमा-फिराकर मुझे बात करनी नहीँ, अनिल को हराने मे मेरा साथ दो तो 5 लाख तुम्हारे और साथ ही प्रधान बनने पर गाँव मे काम कराने के सारे ठेके तुम्हारे। राज का आत्मा काँपा। एक तरफ 20 साल की दोस्ती, दूसरी तरफ नोटों की गड्डी और अनेक फायदे। अन्ततः लालच जीत गया। काँपते हाथों से उसने अनिल की सारी रणनीति और उसकी मदद करने वाले लोगोँ के नाम सब कुछ बता दिया।

सुबह मतदान होना था। सन्तोष ने सब कुछ अपने पक्ष मे कर लिया।अनिल के अपने ही मतदाता, जिनके नाम उसने राज को बताए थे, सब सन्तोष की तरफ हो गए। चुनाव परिणाम आया और अनिल हार गया। अनिल का सब कुछ लुट गया था, उसने एक बार राज की आँखों में देखा पर राज ने नजर हटा ली। अनिल के मन मे सवाल नहीं थे, बस एक सन्नाटा था। “मैं हूँ ना” कहने वाला यार आज नजरें चुरा रहा था। उस रात अनिल छत पर बैठा रहा, तारे टिमटिमाते रहे, और उसका दिल रो-रोकर यही कहता रहा कि जो सबसे अपना था वही पराया निकला।

उधर राज को तो जीत का जश्न मनाना था वह सन्तोष के पास पहुँच गया पर सन्तोष ने उसके मुँह पर 10 हजार रूपए फेंककर कहा “बिकने वालों की बोली नहीं लगती जो दोस्त को बेँच सकता है वह एक दिन मुझे भी बेँच लेगा। नोट हवा में उड़ गए और राज की इज्जत भी। धीरे-धीरे सच्चाई गाँव में फैली। जो कल तक राज को राज भैया कहते थे वही आज उसे गद्दार कहने लगे। मंदिर की घंटी भी बजती तो राज को लगता कि सब उसे ही कोस रहे हैं। रातें करवट बदलते ही कटतीं। तकिया भी रोज भीगता “काश वो कागज नहीं लिखा होता।”

धीरे-धीरे एक साल बीत गया। एक दिन सावन की झड़ी में भीगा हुआ राज अनिल के दरवाजे पर आया। उसके मुँह मे शब्द नहीं थे, सिर्फ आँसू थे। वह अनिल के पैरों में गिर पड़ा। सिसकियाँ बंध गईं ” माफ कर दे यार… मैंने दोस्ती नहीं, खुद को बेच दिया था…”

अनिल ने उसे उठा लिया और कसकर ह्रदय से लगा लिया। अनिल की आवाज में एक ठंडक थी, वह फुसफुया “राज, गले तो लगा लूँगा, तू मेरा भाई है….पर अब वो भरोसा… वो काँच था, जुड़ जाएगा, पर लकीर रह जाएगी।”

उस दिन के बाद राज ने मुँह से कहना बन्द कर दिया। बस करना शुरू कर दिया। अनिल खेत में हल चलाता, राज बैल हाँकता। अनिल गाँव की मदद करता, राज छाया बनकर साथ चलता। मुँह से माफी नहीं माँगी, हर काम से माँगी।

धीरे-धीरे 4 साल बीते और गाँव की जबान बदली। “राज सुधर गया है” की फुसफुसाहट होने लगी।

फिर प्रधानी का चुनाव आया। अनिल फिर से चुनाव लड़ा। इस बार अनिल जीता। जीत का जश्न मनाने के लिए मञ्च तैयार किया गया, पर जीत का भाषण देने से पहले अनिल ने सबके सामने राज का हाथ पकड़ा और माइक पर सिर्फ इतना कहा “ये मेरा दोस्त है। इसने जख्म दिया, और यही मरहम भी बना। इंसान फरिश्ता नहीं होता। गिरता है, तभी उठना सीखता है।”

राज स्टेज पर ही फूट-फूटकर रोने लगा। उसने अनिल के पैर पकड़ लिए। उस दिन उसे 5 लाख नहीं मिले, पर 20 साल की दोस्ती का आधा हिस्सा वापस मिल गया। अधूरा, पर सच्चा।

पीपल के नीचे आज भी दोनों बैठते हैं। पहले जैसी हँसी नहीं है, पर सुकून है। अनिल अब भी राज पर भरोसा करता है, पर उसकी आँखें खुली रहती हैँ और राज अब “मैं तेरे साथ हूँ ना” कहने से पहले हजार बार सोचता है।

(लेखक/कवि/कहानीकार आदित्य त्रिपाठी ग्राम व पोस्ट बालामऊ, हरदोई) के निवासी हैं। आईवी24 न्यूज़ एजेंसी के प्रबन्ध निदेशक और महर्षि विवेकानन्द ज्ञानस्थली के प्रबन्धक होने के साथ प्रतिष्ठित एनजीओ ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। आदित्य की सैकड़ों रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, पोर्टल्स और पुस्तकों मे प्रकाशित हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गयी पुस्तक The Path of Freedom (https://www.flipkart.com/hi/path-freedom-beyond-words/p/itm0d6914b103717) के लेखक हैं। आदित्य शिक्षा, लेखन और, समाजसेवा के क्षेत्र मे कई बार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हुए हैं।)