डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
वह वन निःशब्द था।
पत्तों पर गिरती धूप तक जैसे ठिठक गई हो।
धरती पर पड़ा वह वृद्ध गिद्ध—जटायु—अब उड़ नहीं सकता था, पर उसकी आँखों में अब भी आकाश शेष था।
राम उसके समीप घुटनों के बल बैठे थे।
लक्ष्मण, हनुमान और कुछ वानर थोड़ी दूरी पर खड़े थे—कोई बोलने का साहस नहीं कर रहा था।
जटायु का श्वास टूटता था, फिर जुड़ता था।
उसने अंतिम बार अपने पंख हिलाने का प्रयास किया—वही पंख, जिन्होंने रावण के रथ को रोकने का दुस्साहस किया था।
“वत्स…”
जटायु की आवाज़ जैसे पवन के साथ आई।
राम झुके।
“दक्षिण…”
शब्द अधूरा था, पर अर्थ पूर्ण।
जटायु की आँखें स्थिर हो गईं।
वन में एक क्षण के लिए ऐसा लगा मानो पृथ्वी ने श्वास रोक ली हो।
राम ने जटायु का सिर अपनी गोद में रखा। उनकी आँखें नम थीं, पर चेहरा शांत।
यह शोक किसी प्रिय के बिछोह का नहीं था—यह उस सत्य का शोक था जिसे जान लेने के बाद भी कहना अभी समयोचित नहीं था।
लक्ष्मण ने पहली बार यह मौन तोड़ा।
“भ्राताश्री,”
उनका स्वर संयमित था,
“अब तो स्पष्ट है। रावण ही सीताहरण का अपराधी है। दिशा भी ज्ञात है। फिर… फिर यह खोज क्यों?”
राम ने लक्ष्मण की ओर देखा।
उनकी दृष्टि में उत्तर था, पर शब्द नहीं।
हनुमान ने यह देखा।
वह समझ गया—यह मौन अज्ञान का नहीं था।
यह उस ज्ञान का मौन था, जिसे यदि अभी बोल दिया जाए, तो युद्ध आरंभ होने से पहले ही हार लिया जाए।
राम ने जटायु के पार्थिव शरीर की ओर देखा और धीमे से कहा—
“लक्ष्मण, गति जान लेना और गंतव्य तक पहुँचना—दो अलग बातें हैं।”
लक्ष्मण चुप हो गए।
यह उत्तर नहीं था—यह संकेत था।
किष्किंधा की घाटी में वानर एकत्र थे।
विविध आकार, विविध स्वभाव—
कोई पर्वत-सा विशाल, कोई वृक्ष-सा चपल।
पर एक समानता थी—
सभी की आँखों में एक अनकहा भय।
राम और सुग्रीव के संवाद चल रहे थे,
पर वानरों के बीच फुसफुसाहट कुछ और ही कह रही थी।
“रावण…”
यह नाम कोई ज़ोर से नहीं लेता था।
जो ले भी लेता, वह तुरंत इधर-उधर देख लेता,
मानो नाम के साथ ही कोई छाया आ खड़ी होगी।
रावण केवल लंका का राजा नहीं था।
वह उस युग का भय-राज्य था।
उसकी कथाएँ युद्ध से पहले ही युद्ध जिता देती थीं।
उसका नाम ही सेना को तोड़ देता था।
हनुमान यह सब देख रहे थे।
वे जानते थे—
युद्ध शस्त्रों से पहले मन में जीता या हारा जाता है।
सुग्रीव स्वयं असहज थे।
वाली का भय अभी पूरी तरह मिटा नहीं था,
और अब रावण का नाम—
“प्रभु,”
सुग्रीव ने धीरे से कहा,
“वानर वीर हैं… पर रावण—”
राम ने उन्हें रोका।
“मैं जानता हूँ,”
राम बोले,
“रावण का भय केवल उसकी शक्ति से नहीं,
उसकी कथा से उपजा है।”
उन्होंने वानरों की ओर देखा।
ये वही वानर थे जिन्होंने वाली जैसे पराक्रमी को देखा था,
पर रावण—
रावण उन्होंने केवल कथाओं में देखा था।
और कथा, यदि भय से गढ़ी जाए,
तो वह सत्य से अधिक शक्तिशाली हो जाती है।
लक्ष्मण अब समझने लगे थे।
यदि अभी सबको बता दिया जाए कि
सीता का हरण स्वयं रावण ने किया है,
तो यह सेना समुद्र पार करने से पहले ही बिखर सकती है।
हनुमान ने राम की ओर देखा।
राम ने एक सूक्ष्म दृष्टि से उत्तर दिया।
निर्णय हो चुका था।
रात्रि का समय था।
किष्किंधा के एकांत में केवल चार व्यक्ति बैठे थे—
राम, लक्ष्मण, हनुमान और जाम्बवान।
यह कोई युद्ध परिषद नहीं थी।
यह भय को पराजित करने की योजना थी।
जाम्बवान बोले—
“प्रभु, वानरबल विशाल है,
पर सबके हृदय समान नहीं।”
राम ने सिर हिलाया।
“इसलिए सत्य को अभी पूर्ण रूप में नहीं कहा जाएगा।”
लक्ष्मण चौंके,
पर अब विरोध नहीं किया।
हनुमान ने पूछा—
“तो हम क्या कहेंगे?”
राम बोले—
“हम कहेंगे—
सीता की खोज होनी है।
दिशाएँ देखी जाएँगी।
जो मिले, वही मार्ग बनेगा।”
“और रावण?”
हनुमान ने सीधा प्रश्न किया।
राम की दृष्टि स्थिर रही।
“रावण का नाम पहले केवल उनके सामने आएगा
जो उसे सहने की शक्ति रखते हैं।”
फिर राम ने दक्षिण दिशा की ओर संकेत किया।
“दक्षिण में जाने वाला दल
साधारण नहीं होगा।”
हनुमान, अंगद, जाम्बवान—
यह दल चुना गया।
क्योंकि यदि दक्षिण में भय टूटेगा,
तो उत्तर अपने आप निर्भय हो जाएगा।
राम उठे।
“याद रखो,”
उन्होंने कहा,
“हमें पहले यह सिद्ध करना है
कि रावण और उसकी लंका अजेय नहीं हैं।”
“सीता की खोज से पहले
रावण की कथा को तोड़ना होगा।”
हनुमान ने मस्तक झुका लिया।
अब उन्हें समझ आ गया था—
यह केवल खोज नहीं,
यह एक राजनीतिक–दार्शनिक अभियान था।
और इसकी पहली विजय
युद्धभूमि में नहीं,
मानसभूमि में होनी थी।