जम्मू-कश्मीर से ‘अनुच्छेद ३७०’ का हटाया जाना ‘राष्ट्रहित’ में : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

■ देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, गृहमन्त्री अमित शाह तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ‘राष्ट्रीय अभिवादन’ के पात्र हैं।

पिछले चार दिनों से केन्द्र की सारी चिन्ताएँ ‘जम्मू-कश्मीर’ के प्रति दिख रही थीं। वहाँ के सम्प्रेषणतन्त्र को अवरुद्ध करने, सैलानियों को वहाँ से शीघ्र लौटने, विद्यार्थियों को छात्रावास ख़ाली कर अपने घर जाने, शिक्षणसंस्थाओं को बन्द करने, प्रमुख सड़क-मार्ग को अवरुद्ध करने, वहाँ के प्रमुख नेत्री-नेताओं को ‘नज़रबन्द’ करने, वहाँ सैनिकों की संख्या लगातार बढ़ाने आदिक के निर्णय, घोषणा तथा नीतियों के क्रियान्वयन् को समझते हुए इतना तो निश्चित हो गया था कि केन्द्र-शासन की ओर से जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रहित में कुछ-न-कुछ घटनेवाला है; परन्तु क्या घटेगा, यह समय के गर्भ में था। अन्तत:, वह समय भी आ गया, जब देश ने पूर्ण आज़ादी लेने की दिशा में अपना ठोस क़दम आगे बढ़ा लिया है।

इसके लिए आज (५ अगस्त, २०१९ ईसवी) सदन में गृहमन्त्री अमित शाह ने केन्द्र-शासन के इस निर्णय से अवगत करा दिया है :– जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद ३७० को हटाया जायेगा।

यह एक ऐसा निर्णय है, जो भारत राष्ट्र की पूर्ण स्वतन्त्रता को रेखांकित करता है। इस निर्णय से जम्मू-कश्मीर से उपेक्षित पड़े लद्दाख को मुक्ति मिल जायेगी। लद्दाख अब अलग हो जायेगा और उसका रूप विधानसभारहित संघशासित क्षेत्र का दिखेगा, जबकि जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं, बल्कि पाँचवर्षीय अवधिवाली विधानसभासहित संघशासित क्षेत्र बन जायेगा। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख मेें उपराज्यपाल का प्रभुत्व रहेगा। जम्मू-कश्मीर में पुलिस उपराज्यपाल को रिपोर्ट देगी।

स्मरणीय है कि वर्तमान में जम्मू-कश्मीर का स्वतन्त्र संविधान है और हमारे तिरंगा ध्वज के स्थान पर वहाँ उनका एक अलग प्रकार ध्वज है, जो हमारे राष्ट्रध्वज का प्रत्यक्षत: तिरस्कार है। जम्मू-कश्मीर के लड़की-लड़के यदि किसी अन्य राज्य की लड़के-लड़की से विवाह करते हैं तो उन्हें जम्मू-कश्मीर की नागरिकता नहीं मिल सकेगी। देश के किसी अन्य राज्य का व्यक्ति यदि चाहे कि वह वहाँ रहकर कोई रोज़गार कर ले; अपना घर बना ले तो यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि अनुच्छेद ३७० वैसा करने की अनुमति नहीं देता। इतना ही नहीं, वहाँ की सरकार को यह अधिकार है कि वह जिसे चाहे ‘नागरिकता’ दे सकती है।अब यह अनुच्छेद ‘दोहरी नागरिकता’ को समाप्त कर, ‘एकल नागरिकता’ देगी।

उक्त प्रकार की व्यवस्था करने के लिए गृहमन्त्री अमित शाह ने अभी कुछ ही मिनट-पूर्व ‘जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक’ राज्यसभा में प्रस्तुत किया था, जिसे ६१ मतों के विरुद्ध १२५ मतों से पारित कर दिया गया है। लोकसभा में बहुमत से पारित हो ही जायेगा। अब हमारी केन्द्र-सरकार अतिशीघ्र अनुच्छेद ३७० को वैधानिक रूप में हटाकर जम्मू-कश्मीर को ७२ वर्षों के बाद राष्ट्रीयता की मूल धारा में प्रवेश करायेगी।

देश के समस्त सांसदगण को उक्त विषय पर सुषुप्त ‘राष्ट्रीय चेतना’ को जाग्रत् करते हुए ‘जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक’ को सर्वसम्मति से पारित कराना चाहिए। वैसे अब उक्त विधेयक को ‘अधिनियम’ बनने से कोई नहीं रोक सकता। यहाँ मात्र ‘विरोध के लिए विरोध’ की नीति नहीं चलेगी।

उल्लेखनीय है कि जब तक विधेयक पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर नहीं होंगे और उसे ‘राजपत्र’ में अंकित नहीं कराया जायेगा तब तक अनुच्छेद ३७० के सभी खण्ड अमान्य नहीं होंगे; अर्थात् अनुच्छेद ३७० समाप्त नहीं माना जायेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ अगस्त, २०१९ ईसवी)