प्रत्येक वर्ण के पञ्चमाक्षर/पंचमाक्षर का प्रयोग आप सम्बन्धित प्रत्येक शब्द में लेखनी के माध्यम से तो कर सकते हैं; किन्तु टंकण-माध्यम से कदापि नहीं। ऐसा इसलिए कि 'सॉफ़्टवेअर' की उपलब्धता नहीं रहती।
प्रथम–
उदाहरण के लिए :–
अङ्ग, चञ्चु, कण्ठ, दन्त तथा कम्ब– इनमें पञ्चमाक्षर का प्रयोग है।
अब यहाँ उक्त पञ्चमाक्षरों के प्रयोग उसी ‘सॉफ़्टवेअर’ से किये गये हैं, जिससे कि ‘प्रथम उदाहरण’ के किये गये हैं। अब नीचे के ‘द्वितीय’ पंचमाक्षरों में जो पार्थक्य और वैभिन्य दिख रहे हैं, उनके एकमात्र कारण पर विचार करेंगे तो प्रत्येक शंका और समस्या का क्रमश: समाधान और निराकरण हो जायेगा। द्वितीय– अब पुन: दृष्टि-निक्षेपण करें :–
अलङ्कार, टङ्कित (इन्हें शुद्ध टंकित करें।), आञ्चलिक, अवगुण्ठन, आनन्दित, सम्पादित।
रहा विषय ‘कवर्ग’ के पंचमाक्षर का तो जहाँ तक ‘ङ्’ का शुद्ध व्यवहार हो रहा हो, किया जाना चाहिए। यहाँ अलङ्कार के स्थान पर ‘अलंकार’ अधिक उपयुक्त माना जायेगा, शेष पञ्चमाक्षर शुद्ध लिखा जाये।
शेष पञ्चम वर्ण:– ञ्, ण्, न् तथा म् के प्रयोग में कोई कठिनाई नहीं है।
भाषाशास्त्र के अन्तर्गत शब्दानुशासन है कि यदि किसी भी वर्ण की वर्तनी वर्ण के साथ सम्पृक्त नहीं है तो उसका कोई ‘अर्थ और भाव’ नहीं होता।
उदाहरण के लिए :—
द् वार (वार से जुड़ा समझें।) इसका कोई अर्थ नहीं है। यही शब्द जब ‘द्वार’ के रूप में लिखा जायेगा तब उसकी अर्थपूर्णता विशद् होगी।
ऐसे में, जहाँ तक तकनीकी व्यवस्था साथ दे, शुद्धता का निर्वहण करना चाहिए।
वास्तविकता यह है कि बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा है, जो ‘कुतर्क’ स्थापना करने के लिए ‘अतिरिक्त बुद्धिवाद’ बघारता आ रहा है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ फ़रवरी, २०१७ ईसवी।)