यह दिन्ना है । जीवन चक्र की पर्णहीन व्यथा इसे ‘दीन’ दर्शाती है । यह धर्मिता विरहिणी की भाँति श्रंगार त्यागी वीत-द्वेष-वृती है । तिक्त शीतकाल में देह की दहन-दाह से रिक्त हो, मधुमास की प्रतीक्षा में अधसुप्त है । अन्य सब इसे विरक्त जान, इसकी ओर अलस दृष्टि तक नहीं डालते । इसकी अंतःप्रज्ञा मनोद्भूत नहीं, शांत प्रशान्त नीर निधि की तरह अविचलित है ।

दिन्ना प्रकृति का नवल वासन्तिक लाभ लेने की विकलता में नहीं, सरलता के नियमित सोपान पर आस्थावान है, और अद्भुत लब्धि पाने को आतुर है । इसके अन्तस् की भाषा सतत सर्जन का असहज वाचन करती है । इसकी शाखा शलाकायें विराट अस्तित्व का इन्द्रियजन्य आलाप करती हुई, अन्तरगूँज में लगन मगन रहती हैं । दिन्ना की भूख सभी के हृदय की अतृप्त भूख है ।
दिन्ना में प्रकृति का आत्मांश, इसे आत्मपरक नहीं सुंदरम सत्यपरक आवरण धारण करने को प्रेरित करता है । सुख स्वस्ति और आनन्द के लिये खोजी बने रहने वाले नैतिक मूर्ख की भाँति-कि फिर बसंत आयेगा, आनन्द का उत्सव मनेगा, भ्रमर गीतों के ‘गूँज राग’ सुन मधुलोभी पराग लेने के साथ-साथ परागण भी करेंगे। उत्पाद और व्यय की क्रीड़ा में नव सृजन होगा । बसन्त मालिनी स्वर्ण सी पीली असीम चादर के विस्तार पर शावकी दौड़ में व्यस्त होगी।
अवधेश कुमार शुक्ला ‘मूरख हिरदै’
निराला जयंती, माघ पंचमी, चन्द्र
16/02/2021