
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
सुनामी, कैटरिना, रीटा-जैसी समुद्री तबाही और भूकम्प, तूफ़ान, भूस्खलन, ज्वालामुखी-विस्फोटन, बाढ़, महामारी-जैसी अनेक आपदाएँ पर्यावरण में बढ़ रही मानव की दखलअंदाज़ी के नतीजे हैं। तापमान में अकस्मात् उतार-चढ़ाव– कहीं वर्षा की बारम्बारता का बढ़ना और कहीं बिलकुल वर्षा का न होना, ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की वज्ह से होनेवाले जलवायु-परिवर्त्तन के संकेत है। एक अनुमान के अनुसार, पृथ्वी पर लगभग दस करोड़ प्रजातियाँ हैं; परन्तु जंगलों के अन्धाधुन्ध दोहन से बहुत-से जीव और पादप-प्रजातियाँ लगातार समाप्त होती जा रही हैं। इससे पर्यावरण में असन्तुलन पैदा हो रहा है और पृथ्वी के अस्तित्व पर संकट बढ़ रहा है, जिसका हृदय-विदारक परिणाम और प्रभाव हम भूकम्प के रूप में अच्छी तरह से देखते आ रहे हैं। मनुष्य यदि अपनी अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा से बाज़ नहीं आया तो एक दिन प्रकृति समूची मानव-सभ्यता को खा जायेगी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ५ अप्रैल, २०१८ ई०)