राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी-
हरदोई में सई नदी को बचाने के लिए प्रयास किए जा रहें हैं । सई नदी के समुचित प्रवाह के लिए जिलाधिकारी के आदेश पर तटवर्ती ग्राम सभाओं द्वारा राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी योजनान्तर्गत कार्य कराया जा रहा है । सई का उद्धार हो न हो लेकिन प्रधानों सहित अन्य का लाभ तय है ।
- सई का उद्धार हो न हो लेकिन प्रधानों सहित अन्य का लाभ तय
सई नदी कोई नाला या ड्रेन नहीं है जो उसके किनारों को चमकाने से प्रवाह मार्ग के अवरोध दूर हो जाएंगे । किसी भी नदी के जीवित रहने के लिए उसके वृहत बाढ़ क्षेत्र का होना सबसे ज्यादा आवश्यक है । लेकिन सई नदी के मामले में कुछ और ही प्रक्रिया अपनायी जा रही है । नदी को माइनर या नहर के सापेक्ष मानते हुए हरदोई प्रशासन नदी के किनारों पर मिट्टी डाल कर सई की सांस को घोंटने का काम कर रहा है । जैसे किसी मुर्दे को दफ़नाने के लिए उस पर मिट्टी डाल दी जाती है ठीक वही कार्य सई नदी के मामले में किया जा रहा है । प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार सई नदी के द्वारा भूगर्भ जल स्तर में वृद्धि के लिए नदी के दोनों किनारों व बीच में जमा सिल्ट को मनरेगा मज़दूरों द्वारा हटाने का काम किया जा रहा है । वस्तुस्थिति यह है कि सिल्ट के स्थान पर किनारों से ही मिट्टी को हटाकर किनारे सुरक्षित किए जा रहे हैं ।
जब कभी किसी नदी के पुनरोद्धार के लिए कार्य किया जाता है तो सबसे पहला काम नदी की जलधारण क्षमता बढ़ाना होता है । नदी के मार्ग में क्या अवरोध हैं और उसका प्रवाह क्षेत्र कैसा है, यह जानकर ही नदी की जलधारण व जलसंचयन क्षमता के विकास हेतु प्रयास किए जाते हैं ? हरदोई में सई नदी के जीवन को बचाने का प्रयास मात्र दिखावा है । यह छलावे से ज्यादा कुछ नहीं । कहने को मनरेगा मज़दूर नदी को सिल्ट साफ़ कर रहे हैं किन्तु वह सिल्ट जा कहाँ रही है ? सिल्ट निकालने के नाम पर जहाँ एक ओर नदी के अस्तित्व के साथ छेड़छाड़ की जा रही है वहीं दूसरी ओर सरकारी धन का गबन किया जे रहा है । वर्षा ऋतु के आगमन से ठीक पहले इस तरह का बड़ा प्रयास सद्इच्छा पर प्रश्नचिह्न अंकित करता है ! थोड़ी सी बारिश के बाद ही नदी की स्थिति पूर्ववत हो जाएगी । नदी को ऐसे कार्य से क्या लाभ मिलेगा ? लाभ नदी को नहीं अपितु जिम्मेदारों को मिलने की प्रबल सम्भावना है !
विचारणीय है कि कोई भी सई पुनरोद्धार जैसी योजना अकस्मात नहीं बनती अथवा त्वरित क्रियान्वयन नहीं होता ! सई संरक्षण का प्रयास एक नेक विचार व पहल है किन्तु क्रियान्वयन की विधि दोषयुक्त है । नदी तट पर अवैध कब्ज़े हटाए बिना यह धन व श्रम का अपव्यय मात्र है । सीधे शब्दों में कहें तो सई के मामले में सरकारी धन का दुरुपयोग किया जा रहा है । इससे सई का कुछ भी भला होने से रहा लेकिन रोज़गार गारण्टी योजनान्तर्गत भ्रष्टाचार को अवश्य प्रश्रय मिल रहा है ।
नदी के किनारे बाढ़ क्षेत्र में नमभूमि (Wetlands) या तालाबों का होना अतिआवश्यक है । यह नमस्थान किसी भी नदी के लिए जीवनरेखा या नर्सरी का कार्य करते हैं । उस पर यदि नदी पहाड़ी न होकर मैदानी हो और प्रवाह के विए वर्षा पर ही निर्भर हो । अच्छा होता यदि ग्रामसभा के सहयोग से तटीय तालाबों का निर्माण कराया जाता या फिर नदी में बने प्राकृतिक जलकुण्डों की सफ़ाई कराकर उन्हें और विस्तार दिया जाता । वास्तव में हम सबने नदियों को उनके किनारों में बांध कर रख दिया है । नदियों के बाढ़ क्षेत्र में मानवीय घुसपैठ ने अनेकानेक दुष्कृतियों को जन्म दिया है ।
सई के तट सारस पक्षी के प्रिय आवास रहे हैं । जैसे-जैसे नदी सिमट रही सारस का कुनबा भी सिमट रहा है । दस वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ के आनुषांगिक संगठन लोकभारती (यह संस्था नदी, पर्यावरण व किसानों के लिए कार्य करती है) द्वारा नदियों को बचाने के लिए आयोजित हुए कार्यक्रम में हमारे द्वारा इस विषय में बात की गयी थी । आदरणीय बृजेन्द्र जी के साथ सई को लेकर काफी गंभीर चर्चा की गयी कि नदी को बचाने के लिए पहले उसके पारिस्थितिकी तन्त्र को बचाना होगा । इस क्षेत्र में ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी के अन्तर्गत सई बचाओ आन्दोलन 2008 में शुरू किया गया । सई के पारिस्थितिकी तन्त्र को बचाने के लिए हमारे द्वारा सैकड़ों लोगों के साथ अनशन किया गया । संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष ‘आदित्य त्रिपाठी’ द्वारा “समग्र गङ्गा चिन्तन गोष्ठी” में सई प्रतिनिधि के रूप में प्रतिभाग किया । अनेक बार इस विषय में सरकार से पत्राचार किया गया । लेकिन सरकारी खाऊ-कमाऊ नीति के चलते आन्दोलन स्थगित करना पड़ा ।
सई को लेकर मन में एक टीस सी है । जिलाधिकारी हरदोई पुलकित खरे के व्यक्तित्व व कर्मठता को देखते हुए सई नदी के पुनरोद्धार के उनकी देखरेख में किए जा रहे कार्य से मन अत्यधिक व्यथित हो गया । सई के पारिस्थितिकी तंत्र को नज़रअंदाज कर किए जा रहे थोथे कार्य से केवल भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलेगा । नदी के जीवन में हम जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ विचारकों व जिम्मेदार व्यक्तियों ने तो मौत ही लिखी है ।