सनातन ‘प्रकृति’ है और धर्म ‘चरित्र’

एक बार अधर्म ने धर्म से कहा, “धर्म भाई! मृत्युलोक मे ऐसा एक भी व्यक्ति नहीँ दिखता, जो तुम्हारे तात्त्विक रहस्य को जान सके; इसका कारण क्या है?”

धर्म ने सारगर्भित उत्तर दिया, “भाई अधर्म! जितने भी व्यक्ति दिख रहे हैँ, सब पापी हैँ और उनका पुण्य कभी ‘उदय’ नहीँ होनेवाला है; कोई तन से पापी है तो कोई मन से और ये सभी पतित लोग उद्देश्यरहित होकर चौरासी लाख योनियोँ के पाप-पंक मे डूब और उतरा रहे हैँ। वे सभी पथभ्रष्ट और आचरणहीन लोग ‘राम’ और ‘रहीम’ को ‘धर्म’ मानकर घिनौने कर्मकाण्ड करते आ रहे हैँ; उनका मन-मस्तिष्क तथा हृदयपक्ष इतना मलीन हो चुका है कि वे धर्म के मूल तत्त्व से परे हो चुके हैँ। जिस दिन से ‘तानसिक’ और ‘मानसिक’ पापियोँ का क्षरण होना आरम्भ हो जायेगा उस दिन से न तो तुम्हारा अस्तित्व दिखायी देगा और न ही मेरा।”

धर्म का संतुलित और समयसत्य उत्तर सुनकर अधर्म के मुखमण्डल पर संतुष्टि और शान्ति का भाव देखा जा सकता था, फिर भी अधर्म के मन मे द्वन्द्ववाद विचरण करता रहा।

अधर्म ने धर्म से प्रश्न किया, “धर्म भाई! हम दोनो एक ही माँ के गर्भ से उत्पन्न हुए हैँ, फिर तुममे ऐसी कौन-सी विशेषता है कि तुम्हारे अस्तित्व का बोध न होते हुए भी तुम्हारे भक्तोँ की सर्वाधिक संख्या है और मै एक किनारे पड़ा हुआ हूँ?

इस पर धर्म ने जो उत्तर दिया था, वह अन्धोँ को भी नेत्रसहित करने के लिए पर्याप्त है। धर्म ने रहस्यात्मक मुसकान (‘मुस्कान’ अशुद्ध है।) के साथ उत्तर दिया, “अधर्म भाई! तुम अधर्म हो, इसलिए उस सत्यसूत्र को पकड़ने मे ‘क्षम’ (‘सक्षम’ अशुद्ध है।) नहीँ हो। जिन्हेँ तुम मेरा भक्त कह रहे हो, वे वास्तव मे, तुम्हारे सेवक हैँ। तुम तो निठल्ले पड़े रहते हो; सत्यसंधान करने की/का सामर्थ्य भी तुममे नहीँ है। अच्छा मेरे प्रश्नोँ के उत्तर दो।”

उत्सुकता और जिज्ञासावश (‘जिज्ञासाबस’ अशुद्ध है।) अधर्म बोल पड़ा– अच्छा; पूछो।

धर्म ने पहला प्रश्न किया, “यह बताओ― सूर्य उगता है?”
अधर्म का उत्तर था, ”निस्सन्देह, उगता है।”

धर्म का पुन: प्रश्न था, “फिर तो सूर्य डूबता भी है?”
अधर्म ने उत्तर देते हुए कहा, “भाई! इसमे कौन-सी सोचने की बात है; डूबता भी है।”

धर्म ने मसकुराते हुए समझाया, “अधर्म भाई! जैसे तुम वैसे तुम्हारे चाहनेवाले। तुम्हेँ जानना चाहिए कि सूर्य चराचर-जगत् का आत्मा (‘आत्मा’ पुंल्लिंग-शब्द है।) है। सूर्य न तो उगता है और न ही डूबता है; वह अपने एक निश्चित स्थान पर बना रहता है तथा प्राकृतिक कारणो से प्राणिमात्र उसे उगता-डूबता समझ लेता है। सूर्य का यही चरित्र ‘सनातन’ है; शाश्वत है एवं चिरन्तन भी। जो शाश्वत है, वह संघटित है, विघटित नहीँ।”

अधर्म का कुतूहल बढ़ता जा रहा था; उसने एक और प्रश्न कर लिया, “अच्छा धर्म भाई! जब सूर्य ‘सनातन’ है तब धरती के कुछ लोग ‘हिन्दू’ को सनातन क्योँ कहते हैँ?”

”क्योँकि धरती के एक नितान्त गर्हित, धृष्ट तथा उद्दण्ड-वर्ग के द्वारा जनमानस की आँखोँ पर एक सर्वथा संकुचित, किन्तु सम्मोहक आवरण डाल दिया गया है, ताकि वे उस सत्य के साथ साक्षात्कार न कर सकेँ, जो उनके आत्मविकास को स्वस्थ दिशा मे ले जाने मे समर्थ है और उन्हेँ ‘सनातन’ तथा ‘हिन्दू’ के मध्य अन्तर का ज्ञान और भान कराने मे भी।”

धर्म के अत्यन्त धीर-गम्भीर उत्तर को ग्रहण करने के पश्चात् अधर्म विचलित होने लगा।

अधर्म ने धर्म की ओर असंतुष्टमयी मुद्रा मे देखते हुए, एक और प्रश्न किया, “अच्छा धर्म भाई! मेरे दो प्रश्न हैँ :― एक शब्द मे उनके उत्तर बता दो, ” वास्तव मे, ‘सनातन’ क्या है और ‘धर्म’ क्या है?”

धर्म ने कहा, “भ्राता अधर्म! मेरा अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करने का समय हो चुका है; जाते-जाते, उत्तर भी सुन लो, ”सनातन ‘प्रकृति’ है और धर्म ‘चरित्र’।”

धर्म के उत्तर ग्रहण करने के अनन्तर अधर्म से रहा नहीँ गया और वह बोल पड़ा, “इसीलिए कहा गया है, “धारयति इति धर्म:। जिसे धारण किया जाता है, वह धर्म है। प्राणिमात्र ‘चरित्र’ को धारण करता है, जो उसके ‘आचरण की सभ्यता’ को प्रकाशित करता है और ‘प्रकृति’ सनातन है, जो निर्दोष, निष्पाप तथा निष्कलंक होती है और चिरन्तन भी।”

फिर अधर्म अति उत्साह मे बोल पड़ा, “धर्म की जय हो!”
उधर, धर्म अपनी सधी गति मे अपने गन्तव्य के लिए प्रस्थान कर चुका था।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० जनवरी, २०२५ ईसवी।)