राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’-
मुस्लिमों के संस्कृत व हिन्दुओं के अरबी/फारसी पढ़ने व पढ़ाने पर लड्डू बांटना उचित है । डॉ. फिरोज खान द्वारा संस्कृत के अध्यापन में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए ? किन्तु विधर्मी (काफिर) द्वारा धर्मशास्त्र का शिक्षण सर्वथा अनुचित है और वैश्विक समुदाय भी इसी के अनुकरण करता है । कुरान और हदीस के विषय में पढ़ाने वाला क्या ग़ैरमुस्लिम हो सकता है ? क्या चर्च में ईसाई पद्धतियों को सिख वाला ग़ैर-ईसाई हो सकता है ? ऐसे में फिरोज प्रकरण को तूल देना समझ से परे है ।
आप सब के फिरोज के पक्ष में खड़े होने से क्या इस्लाम में बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) हराम (निषिद्ध) की जगह जायज़ हो जाएगी है ? जो स्वयं मूर्ति पूजा नहीं कर सकता (इस्लाम इज़ाजत नहीं देता और यदि फिरोज द्वारा मूर्ति पूजा की गयी तो कमलेश तिवारी को जिबह करने वाले फिरोज को भी हलाल करेंगे ) आख़िर वह कैसे धर्मशास्त्रगत मूर्तिपूजा का सिद्धान्त पढ़ाने में अधिकृत किया जा सकता है ? संस्कृत भाषा के अध्ययन में सब अधिकृत हैं, लेकिन वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तो अधिकार का विचार सर्वथा कर्तव्य है ।