★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मैं गंगा-गोमती से लखनऊ जा रहा था। मेरे पार्श्व में दो महिलाएँ एक बच्चे के साथ बैठी हुई थीं। मैं अपनी पुस्तक ‘समग्र सामान्य हिन्दी’ और ‘समग्र सामान्य ज्ञान’ के अन्तिम प्रूफ़ का क्रमश: परीक्षण कर रहा था। उसी मध्य, एक स्वर उभरा। मैं अपने सारस्वत कर्म में तल्लीन था। वह स्वर एक महिला का था।
मेरा ध्यान तब भंग हुआ जब वह एक बच्चे को बताने लगी थी, “देख वो बेटे! कौवा … काउ है। वह लगातार यही बोले जा रही थी, तभी उस महिला के साथवाली दूसरी महिला ने कहा, “देखो! उस कौए को– क्रो को–क्रो को, फिर उस पहलीवाली महिला ने झेंप मिटाते हुए अपने बच्चे से प्रश्न किया था, अच्छा बता! कौए और कोयल में क्या ‘डिफरेंस’ है?”
उस बच्चे का उत्तर था, “मोम! यह कौए और कोयल क्या होती है?
उस बच्चे का प्रश्न मौन की वर्षा कर रहा था। इधर, मैं अपने मौन के टूटते बाँध को बाँधते रहने का प्रयास करता रहा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० मार्च, २०२१ ईसवी।)