सम्प्रेषण कला-कौशल को धारण करना सीखें

पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

अधिकतर लोग तर्क प्रस्तुत करते हैं– भाषा की शुद्धता की क्या आवश्यकता है; हमारा भाव सम्प्रेषित हो जाता है, इतना ही बहुत है।

ऐसे लोग से हमारा प्रश्न है– आप लोग को घर से बाहर सज-धजकर : आकर्षक रूप-विन्यास, केश-विन्यास तथा वस्त्र-विन्यास कर निकलने की क्या आवश्यकता है? आप जिस परिधान को धारण करके सोये हुए हैं अथवा दिगम्बर रूप में हैं अथवा जिस भी रूप में हैं, उसी रूप-अवस्था में घर से बाहर क्यों नहीं निकलते हैं?

जिस प्रकार से आप शरीर की शुद्धि करके बाहर आते हैं और अपने व्यक्तित्व को आकर्षक रूप में प्रदर्शित करना चाहते हैं, उसी प्रकार आपको ‘अभिव्यक्ति’ (वाचन और लेखन-स्तर) के स्तर पर सम्यक् शुचिता के साथ स्वयं के कर्तृत्व को भास्वर और कान्तिमान् बनाना होता है, जो आपकी अभिव्यंजना का सौन्दर्य होता है; शब्द-शोभन होता है; जो मूलत: आपके अन्त: व्यक्तित्व का मानदण्ड और मापदण्ड होता है; साथ ही आपके बाह्य व्यक्तित्व को द्युतिमान् भी करता है।

वाग्वैदग्ध, वाग्मी, विचक्षण, विलक्षण आदिक भास्वर शब्द-सम्पदा से सम्बोधित वही होता है, जो शब्द-साधक होता है। आपके पास यदि संदूषणरहित शब्द-संज्ञान नहीं है तो आपकी शिक्षा-प्रशिक्षा का औचित्य क्या है?

कैसी विडम्बना है कि ऐसे विचार करनेवाले लोग विद्यार्थी-जीवन में शब्द-शब्द की शुद्धि के प्रति अतिरिक्त रूप में सजग, सचेष्ट, सतर्क तथा सावधान रहा करते थे; और अब, जब निहित उद्देश्य की पूर्ति हो गयी तब उसी भाषा-सौन्दर्य के साथ बलप्रयोग करते हुए दिख रहे हैं?

आत्मालोचन कीजिए, ताकि हमारे अभिप्राय के साथ आप जुड़ सकें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ मई, २०२० ईसवी)