★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हमारे देश की युवाशक्ति का इस स्तर तक विकेन्द्रीकरण कर दिया गया है कि वह अपने साथ किये जा रहे अन्याय को ‘भाग्यप्रदत्त’ मानकर ‘कुण्ठा’ की दशा को प्राप्त कर गयी है। केन्द्र और राज के शासक विशेषत: राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन/भारतीय जनता पार्टी-समर्थित राज्य-शासकों ने अपना मायाजाल इस स्तर पर फैला दिया है कि युवावर्ग का मन-मस्तिष्क परजीवी हो चुका है। वह अपने भविष्य के विषय में सोचने-समझने की सामर्थ्य लगभग खोता जा रहा है। यह परिवर्त्तन अकस्मात् नहीं है, प्रत्युत इसके पीछे केन्द्र और उक्त राज्य-सरकारों की पूर्वनियोजित-सुनियोजित गहरी चाल है। सत्ता की राजनीति के पीछे राष्ट्रीयता की तिलांजलि देनेवाले उक्त शासक अब ‘मनबढ़’ हो चुके हैं, जिसके पीछे कथित शासकों द्वारा ‘हिन्दुत्व की अफ़ीम’ चटाकर-स्वत: चाटकर बेसुध दिख रही देश की जनता की निष्क्रियता दिख रही है। आज देश के केन्द्र और राज्यशासकों के उदासीन असहाय दशा-दिशा के कारण हमारा युवावर्ग हताशा, कुण्ठा, निराशा, सन्त्रास तथा अवसाद का जीवन जीने के लिए बाध्य है। ऐसा इसलिए भी कि राष्ट्रीय नेतृत्व की इच्छाशक्ति इतनी नपुंसक हो चुकी है कि पुरुषार्थ रह ही नहीं गया। देश को कई भागों और खण्डों में बाँटकर “फूट डालो और शासन करते रहो” के अतिरिक्त उसका अन्य कोई उद्देश्य भी नहीं है। भविष्य सुरक्षित करने की लालसा में देश का युवावर्ग इधर-उधर भटकता फिर रहा है; उसके भविष्य को समुज्ज्वल बनाने के लिए अवसरजीवी और विश्वासघाती शासकों के पास कोई पारदर्शी योजना नहीं है।
योजना समष्टिमूलक हो; पारदर्शी हो; भेद-भाव रहित हो तथा योग्यता के आधार पर उसका सत्यनिष्ठा के साथ क्रियान्वयन् हो। आज आजीविकावृत्ति (पेंशन) पा रहे सेवानिवृत्त कर्मीजन को पुन: सेवा में न लेकर, युवा-वर्ग का भविष्य सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
देश के युवाओं को चाहिए कि वे इन्हीं विन्दुओं पर शासन चलानेवालों को नीचे से ऊपर और आगे से पीछे तक घेर लें।
अपनी दुर्दशा के लिए देश का युवा-वर्ग सर्वाधिक उत्तरदायी है, जो अपने भविष्य को दाँव पर लगा तथाकथित हिन्दुत्व का माला जप रहा है। ऐसे लोग दुरवस्था को प्राप्त करेंगे, तब कहीं उनकी आँखें खुलने की स्थिति में आ पायेंगी।
युवावर्ग को ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’, ‘दलित, पिछड़ी’ जातियों का नारकीय चलचित्र दिखाकर उनकी मति हर ली जा रही है, ताकि सभी असन्तुष्ट शिक्षित बेरोज़गार बँटे रहें और माननीयगण उल्लू सीधा करते रहें। युवाओं को कारागार में डालकर उनका भविष्य नष्ट करने का शासकीय उपक्रम विश्व-विदित है। ऐसा इसलिए कि अपना शोषण करवाते रहो और मुँह बन्द किये रहो।
वास्तव में, इसी यथार्थ का प्रत्यक्षीकरण हो रहा है; किन्तु ऐसा कब तक चलता रहेगा?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ मार्च, २०२१ ईसवी।)