राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ :

देवालय के देव रो रहे, रीति सनातन हारी है ।
मदिरालय की मदहोशी ही, राजनीति पर तारी है ।
नहीं दिखी दुर्गापूजा, रामजन्म ताले के भीतर ।
हनुमान जयन्ती के अवसर पर, लड़ते हमने देखे तीतर ।
बाज़ारों पर अंकुश की ही, यहाँ रही तैयारी है ।
देवालय के देव रो रहे, रीति सनातन हारी है ।।
रामराज का राज रो रहा, मन के बीमारों को लखकर ।
सन्त असन्त का मिटा भेद, प्याले में हाला भरकर ।
मदिरा तो मद की पूरक है, पर ऐसा भी मद ठीक नहीं ।
भावशून्यता कठिन समय में, किसी कोण से ठीक नहीं ।
मद्य निषेधक नियम सूचिका, राजनीति से हारी है ।
देवालय के देव रो रहे, रीति सनातन हारी है ।।
अंत्येष्टि में भीड़ नहीं हो, शादी ब्याह अकेले करना ।
रिश्तेदारी में जो रह गए, उन्हें वहीं होगा रहना ।
चौराहे जो मिले टहलते, वो समाज के दुश्मन हैं ।
मदिरालय की पंक्ति वाले, लेकिन सबके सब सज्जन हैं ।
ये कैसी है राजनीति जहाँ, स्वहित धर्म पर भारी है ।
देवालय के देव रो रहे, रीति सनातन हारी है ।।