विद्यार्थियों की गुरु के प्रति श्रद्धा और सीखने की ललक देखते ही बनती थी!

एक समय था, जब इलाहाबाद का क्षेत्र ‘गोविन्दपुर’ इतना बीहड़ होता था कि लोग-बाग़ वहाँ जाने से डरते थे; परन्तु हमे नहीं भूलना चाहिए कि ‘सभ्यता का विकास’ ऐसे ही बीहड़ और दुर्गम परिवेश मे ही हुआ है। आज, वही मूल गोविन्दपुर कई भागों मे विभाजित होकर अपना सुसभ्य आकार ग्रहण कर चुका है। वह कहीं गोविन्दपुर कॉलोनी के रूप मे दिखता है; कहीं गोविन्दपुर आवास-योजना तो कहीं हाइडिल कॉलोनी। गोविन्दपुर के अन्तिम छोर पर ‘सलोरी’, ‘शतुरख़ाना’ (मध्यकालीन इतिहास मे ऊँटों की सेना का विभाग ‘शतुरख़ाना’ कहलाता था।) आदिक क्षेत्रों मे जनसंख्या का इतना विस्तार है कि वहाँ प्रतिदिन सहस्राधिक विद्यार्थियों की गतिविधियों के कारण गमनागमन-मार्ग (‘आवागमन’ अशुद्ध है।) अवरुद्ध दिखते हैं। प्रयागराज मे आज वरीयताक्रम मे सर्वाधिक जनसंख्यावाले जितने भी क्षेत्र हैं, उनमे ‘सलोरी’ का विशेष स्थान है।

उसी सलोरी मे कई शिक्षण-दीक्षण-संस्थान हैं; पुस्तक-विक्रेताओं की एक सिरे से दूसरे सिरे तक प्रतिष्ठान हैं। इस कारण वहाँ विशेषत: प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों की अति व्याप्ति रहती है। वहीं पर एक शैक्षिक संस्थान ‘हिन्दी-संसार ऑनलाइन’ है। गत ६ मई को उस संस्थान मे शिक्षण कर रहे अपने विद्यार्थियों के साथ संलाप और संवाद करने का एक ऐसा क्षण उपस्थित हुआ, जो विलक्षण था।

सभागार मे समुपस्थित ८ हज़ार विद्यार्थियों के मध्य से आयोजन-मंच तक पहुँचने मे मन-प्राण बाधक बन रहे थे; क्योंकि दोनो ओर से प्रिय छात्र-छात्राओं की ओर से की जा रही पुष्पवर्षा, चरण-संस्पर्श करने के प्रति आतुरता तथा उनका उत्साह-उमंग पग-संचलन को भावातिरेक मे विचलित कर रहे थे। मंच तक पहुँचना तो था ही, ध्येय, उद्देश्य तथा लक्ष्य का भान होते ही पग को गति मिल गयी और डग ऊर्जस्वित हो उठे।

अभिवादन का क्षण भी मनोरम था; विद्यार्थी अपने स्थान पर अविचलित खड़े रहे; करतल-ध्वनि करते रहे; हमने अनेक बार बैठने के संकेत किये, फिर वे बैठे।

उक्त संस्थान के निदेशक प्रियवर डॉ० अशोक स्वामी जी की सदाशयता और मनुष्यता का जब बोध हुआ तब लगा कि भावना-संवेदना का संरक्षण ऐसे जन ही करते हैं। अभावग्रस्त विद्यार्थियों को निश्शुल्क विद्यादान करना; उन्हें यथाशक्य प्रत्येक प्रकार की सहायता करना; सुविधा-साधन उपलब्ध कराना, यही तो सच्ची मनुष्यता है, जिसके प्रतिमूर्ति के रूप मे अशोक स्वामी जी लक्षित होते हैं।

वैसे तो हम किसी ‘कोचिंग संस्थान’ मे जाते नहीं हैं; क्योंकि बहुसंख्य कोचिंग-संस्थापक ‘धन्धेबाज़’ दिखते हैं; लूटतन्त्र के पोषक होते हैं। यह हमारी किसी कोचिंग संस्थान मे दूसरी बार जाना हुआ था; क्योंकि ३ मई को जिस कोचिंग संस्थान मे जाना हुआ था, वह भी उसी की एक शाखा है।

सभी विद्यार्थियों के मुखमण्डल पर ओज था और नेत्रों से जिज्ञासा, उत्सुकता, कौतुक तथा व्यग्रता झाँकती हुई-सी संलक्षित हो रही थी।

मंच पर की जानेवाली समस्त औपचारिकताओं से मुक्तिप्राप्त करने के अनन्तर/पश्चात् (यहाँ ‘उपरान्त’ अशुद्ध है और अनुपयुक्त भी।) विद्यार्थियों को सम्बोधित करना था; सहज स्वर प्रस्फुटित हुए, “हमारे विद्यार्थी शुद्ध शब्द-वाचन और लेखन के प्रति सजग नहीं हैं, जिसके कारण वे परीक्षा मे अपनी उत्तरपुस्तिका मे जो लिखकर आते हैं, उसी को शुद्ध मान लेते हैं। इसमे उनका दोष नहीं है; दोष उनका है, जो उनका अशुद्ध और अनुपयुक्त अध्यापन करते आये हैं।”

हमारी प्रशिक्षण-पद्धति अन्य से इतर (भिन्न) रही है। अधिकतर अशुद्ध शब्द-लेखन करना और उनमे कौन-सा शुद्ध है, विद्यार्थियों से प्रश्न करना। इससे ज्ञात हो जाता है कि विद्यार्थी ने वस्तुत: सार्थक शब्द को ग्रहण किये हुए है वा नहीं। इस पाठशाला मे उपस्थित विद्यार्थी चैतन्य थे। कहाँ पर ‘अनुस्वार’ का व्यवहार होता है और कहाँ पर ‘अनुनासिक’ का, इनके प्रति सजगता दिखी थी; परन्तु अनुस्वार और अनुनासिक का क्यों और कहाँ पर प्रयोग होता है, इनका बोध कराना आवश्यक हो गया था।

दूसरा पक्ष यह दिखा कि विद्यार्थी जिस परीक्षा मे सफलता अर्जित करने के प्रति तत्पर (तैयार) हैं, वे अपने निर्धारित पाठ्यक्रम से अवगत नहीं हैं; क्योंकि जब उनसे प्रश्न किया गया, “पाठ्यक्रम मे अनुवाद है? निबन्ध है? अपठित है? भावपल्लवन है? पत्रलेखन (आलेखन-प्रारूपण) है? सारांश-सारलेखन, संक्षिप्त लेखन है? इन प्रश्नो के उत्तर समवेत स्वर मे नहीं मिले।

एक विषय ‘अक्षर’ और ‘वर्ण’ मे क्या अन्तर है? किसको ‘वर्ण’ कहा जायेगा और किसको ‘अक्षर’, इसे विद्यार्थी अभी तक सुस्पष्टत: नहीं समझ पाये हैं, इसका बोध हुआ। उस संस्थान मे हमने जब बताया कि ‘क’ अक्षर है तब विद्यार्थी इसे शालीनतापूर्वक स्वीकार नहीं कर रहे थे; क्योंकि उनका तर्क था― ‘क’ का विभाजन (क्+अ) के रूप मे कर सकते हैं। मै कुछ क्षण के लिए उनके तर्क को स्वीकार नहीं कर रहा था और विद्यार्थी भी मेरे तर्क को स्वीकार नहीं कर रहे थे। मुझे लगा, वे विद्यार्थी उपयुक्त अन्तर जानते तो हैं; परन्तु अपने उस सम्बोध (उत्तम ज्ञान वा अच्छी समझ) के प्रति विश्वस्त नहीं थे। वहाँ उनके वह अध्यापक भी थे, जो उन्हें व्याकरण का अध्यापन करते थे। मैने उन्हें इसलिए आमन्त्रित किया था कि समझा जा सके कि विद्यार्थियों को क्या बताया गया था। उनसे दोनो मे अन्तर सुस्पष्ट करने के लिए कहा था; उन्होंने लेखन करके उत्तम प्रकार से समझा दिया था। वास्तव मे, दीक्षित करने की यह एक सहज प्रक्रिया है। हमारे विद्यार्थी उक्त अन्तर को सुस्पष्टत: समझ चुके थे।

कई वाक्य ऐसे थे, जिनके एक ही वाक्य के अन्तर्गत ‘संज्ञादोष’, ‘कर्त्ता-दोष’, ‘कर्मदोष’, ‘क्रियादोष’, ‘संधिदोष’, ‘समासदोष’ तथा ‘कारकदोष’ दिख रहे थे। विषम वाक्यगठन का शुद्धतापूर्वक पुनर्लेखन कैसे किया जाता है, इसका व्याकरणसम्मत बोध कराया गया था। वैसे ही असंतुलित वाक्यविन्यास मे प्रयुक्त शब्दों के दोष दूर करते हुए; शुद्ध और उपयुक्त शब्द-व्यवहार करते हुए, उनकी सार्थक उत्पत्ति बतायी गयी थी। सारलेखन, सारांशलेखन, भावपल्लवन आदिक पर भी प्रकाश डाला गया था। समानार्थी और भिन्नार्थी शब्दों तथा उनमे व्याप्त तात्त्विक अन्तर को भी सुस्पष्ट किया गया था।

हमारे शब्दसम्प्रदाय मे उपसर्ग की कितनी उपयोगिता और महत्ता है; उपसर्ग किस शब्द की प्रकृति को अपने प्रभाव से नकारात्मक और सकारात्मक रूप और अर्थ प्रदान करते हैं, इसका मूल ज्ञान कराया गया था।

उपर्युक्त (‘उपरोक्त’ अशुद्ध है।) पाठशाला मे व्याकरण के समस्त अंग-उपांगों का स्पर्श करते हुए, शब्दप्रयोग की शुचिता के प्रति आगाह किया गया था।

ऐसे शताधिक शब्दों के शुद्ध व्यवहार सिखाये गये थे; विराम-विरामेतर-चिह्नो (‘विरामेत्तर’ अशुद्ध है।) के प्रयोग सिखाये गये थे, जो अभी तक अपने अशुद्ध रूप मे व्याप्त हैं।

विद्यार्थी जिज्ञासु थे; शिक्षित-दीक्षित होने के प्रति आग्रहशील थे। उनमे से अधिकतर विद्यार्थियों की सफलता असंदिग्ध है; क्योंकि वे ‘मार्ग’ से निकलकर ‘पथ’ पर अग्रसर हो चुके हैं, जो कि उनका मूल ‘हेतु’ है और गन्तव्य भी।

हमारे सभी विद्यार्थी सारस्वत पथ पर अग्रसर रहें, आशीर्वचन है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ मई, २०२३ ईसवी।)