अर्ज किया है :- दोमुँहे साँपों से बचने की तरकीब आसां नहीं

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डे- 


एक : वह वादाशिकन है, पलकों पे बिठाना मत,
गर नज़रों में समायी तो पछतायेगी ज़िन्दगी।
दो : ज़िन्दगी भीख में मिला नहीं करती प्यारे!
मौत के जबड़े से छुड़ा लेने की क़ुव्वत रख!
तीन : ठिठक जाओगे तो दूर तक पछताओगे,
बुलन्द हौसले को मंज़िल सलाम करती है।
चार : तुझे रौशनी प्यारी है तो चल, दूर हट!
मेरे हिस्से के अँधेरे पे नज़र न लगा।
पाँच : सच को समेट कर उसने तकिया बना लिया,
चादर-सा फैला झूठ मुँह चिढ़ाता रहा उसे।
छ: : मैं बेक़ुसूर हूँ और क़ुसूरवार भी,
हर सज़ा आँखों में सजा लेता हूँ।
सात : दोमुँहे साँपों से बचने की तरकीब आसां नहीं,
ज़ह्र निकले या मुँह कुचले तो फिर बात बने।
आठ : बैठे-बिठाये इक नायाब कहानी बन गयी,
दुष्यन्त की अँगूठी-जैसी निशानी बन गयी।