भारतीय न्यायाधीशगण विचार करें

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


वास्तव में, ‘समलैंगिकता’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ एक प्रकार का व्यभिचार है; एक दुष्प्रवृत्ति है; पारस्परिक सहमति के बावजूद वह एक प्रकार का अपराध है, जो अब तक की आपराधिक घटनाओं से स्वयंसिद्ध हो चुका है ।
ऐसे में, सहज ही प्रश्न है : आपसी सहमति से जब अभिसार-व्यभिचार तथा वेश्यावृत्ति होती है तब उसे वैध सिद्ध क्यों नहीं किया जाता ? क्यों वहाँ ख़ाकी वर्दी वाले पहुँचकर सम्बद्ध लोग, वेश्या और उसके साथ सम्भोग कर रहे ग्राहक को पकड़ कर ले जाते हैं ? यहाँ पर हमारा क़ानून मौन हो जाता है, क्यों ? ‘बार गर्ल’ भी देह-व्यापार करती हैं और न्यायालय उसे वैध ठहराता है, क्यों ? कोई अधिवक्ता है, जवाब देने वाला ? कोई न्यायाधीश है, इसका न्यायपरक निदान करनेवाला ?
हम वयस्क हैं। हम जिस वेश्या के साथ सम्भोग कर रहे हैं, वह भी वयस्क है। ऐसे में, हमारी आज़ादी छीनने का अधिकार कहाँ से और कैसे जन्म ले लेता है? न्यायालय का नज़ीर यहाँ काम क्यों नहीं करता ?
इसमें कोई दो राय नहीं कि न्यायालय ने इस विषय को ‘नैतिकता’ की दृष्टि से देखने से अस्वीकार कर दिया है, जो कि आनेवाले समय में अति घातक रूप में यत्र-तत्र-सर्वत्र लक्षित होगा।