★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
■ भारतीय दर्शनशास्त्री (यहाँ ‘दार्शनिक’ शब्द का प्रयोग अशुद्ध है और अनुपयुक्त भी।) ‘चार्वाक’ का भौतिकवादी कथन समझिए :–
“यावज्जीवेत सुखं जीवेद, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत।”
(जब तक जियें सुख से जियें और ऋण लेकर घी पियें।)
● श्रीलंका अघोषित दिवालिया देश बना।
● वहाँ आर्थिक आपात्काल लागू।
● श्रीलंका की आर्थिक स्थिति छिन्नभिन्न हुई।
● विश्व का सबसे बड़ा क़र्ज़दार देश बना।
● उसने भारत, चीन तथा जापान से बहुत बड़ी धनराशि ऋण के रूप मे ली है।
● अब श्रीलंका-सरकार के कोष मे देश को चलाने के लिए कुल १.५८ अरब डॉलर रह गये हैं।
● विदेशी मुद्रा के रूप में श्रीलंका के पास १७.५ हज़ार करोड़ रुपये शेष रह गये हैं।
● भीषण महँगाई के कारण वहाँ की जनता उग्र प्रदर्शन कर रही है।
महँगाई चरम पर :–
चाय– ₹१०० कप, आलू– ₹२०० प्रति किलोग्राम, आटा– ₹५००, दूध– ₹१,००० लीटर।
■ निकट भविष्य मे इस विषय पर एक सुव्यवस्थित विचार-विश्लेषण समाचारपत्रों के माध्यम से सार्वजनिक करूँगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)