—— ० चिन्तनपक्ष ०—–
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
आपकी किसी टिप्पणी पर यदि कोई भी व्यक्ति बिना विचार किये ‘निन्द्य’ टिप्पणी करता हो तो उसे ‘तत्काल’ निरुद्ध कर दें; जैसा कि मैं करता आया हूँ। वैसा व्यक्ति आपके विचारों में केवल ‘मीन-मेख’ निकालता रहेगा। ऐसा नहीं कि वह आपकी भूल/दोष को दूर/संशोधित करता हो। संशोधित-परिष्कृत करे तो उसका चार डग भरते हुए स्वागत होगा; वैसा छद्मवेशी बुद्धिजीवी पूर्वग्रह (‘पूर्वाग्रह’ का प्रयोग अशुद्ध है।) से युक्त मनोवृत्ति का परिचय प्रस्तुत करता रहेगा।
आप यदि लोककल्याण की दृष्टि से अपने भाव-विचार सम्प्रेषित करते हैं तो कुछ ऐसे लोग उसे पचा नहीं पाते हैं, जो ‘परजीविता के परम्परा-युग’ में ‘उधार’ का खाते-पीते-पहनते आ रहे हैं और वय-वार्द्धक्य के साथ ‘चाटुकारिता’ को जीते आते हैं। ऐसे में, वे कथित लोग ‘मौलिक’ नहीं बन-हो सकते और जब उनके चेहरे पर कोई वास्तविक वैचारिक-बौद्धिक तमाचा जड़ा जाता है तब वे तिलमिला उठते हैं; क्योंकि उस चिन्तनप्रधान प्रहार का प्रभाव उनकी खोखली जड़ में मट्ठा डालने का काम करता है।
आप यदि पारदर्शी विचारजीविता को प्रश्रय देते हैं तो आप स्वयं को उस विचारविन्दु के समीप पाते हैं, जहाँ पर कुछ ही लोग दिखायी देते हैं, जिनमें से अधिकतर ऐसे चेहरे होते हैं, जिनके चेहरे ‘अपने चेहरे’ नहीं होते; क्योंकि वे लोग प्याज के छिलके की तरह से ‘चेहरा-पर-चेहरे’ लगाये रहते हैं; गिरगिट-सदृश आचरण की सभ्यता प्रकट करते रहते हैं, जिन्हें आप अपनी सहजता के लिए ‘रँगा सियार’ की संज्ञा दे सकते हैं। ऐसे लोग की वैचारिक बस्ती में आप जैसे ही अपने पाँव रखते हैं, उनके पाँव तले ज़मीन खिसकने लगती हैं; क्योंकि आप स्वत:-स्फूर्त चेतना और आत्म अध्यवसाय के बल पर अपने सुदृढ़-सुविचारित चिन्तन-धरातल की रचना किये होते हैं और ‘रँगा सियार’ के चरित्र जीनेवाले का धरातल नितान्त ‘रेतीला’ होता है, इसलिए वे ‘उधार के तर्क’ प्रस्तुत करते हुए, आपकी ठोस मौलिकता को शिथिल करने का असफल प्रयास करते हैं।
आपका साधनापक्ष शक्त (‘सशक्त’ अशुद्ध है।) और सुदृढ़ है तो कोई भी विचारक्षीण तथ्य और तर्क आप पर कदापि प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता। आपके दृष्टिवैभव की द्युति के सम्मुख ‘नकारात्मक तत्त्व’ बार-बार पराजित होते रहेंगे।
सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ मार्च, २०२२ ईसवी।)