सुपरटेक द्वारा निर्मित विवादित ट्विन टावर भ्रष्टाचार का हिमालय

नोएडा सेक्टर- 93 में सुपरटेक द्वारा निर्मित विवादित ट्विन टावर भ्रष्टाचार का हिमालय है।

इस टावर को बनाने में हर तरह के नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई है:-

  1. जिसे ग्रीन एरिया बताकर पहले लोगों को फ्लैट बेचे गए , उसी में यह ट्विन टावर बना दिए गए ।
  2. दो टावरों के बीच की दूरी का ख्याल न रखा गया।
  3. इन टावरों की ऊंचाई कई बार और कई अधिकारियों की मिलीभगत से बढ़ाई गई।
  4. बिल्डिंग एक्ट का खुलेआम उल्लंघन हुआ है। इसे बनाने में 70 करोड रुपए और कुल 3 वर्ष का समय लगा और अब इसे 20 करोड रुपए खर्च करके ध्वस्त किया जाएगा। इस बीच दसियों साल चले हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का व्यय अलग हैं। क्या 9 सेकंड में इन सैकड़ों करोड़ रुपए को आग लगा देना इस देश की आर्थिक स्थिति के साथ अन्याय नहीं है?
  5. इस हिसाब से तो अगली बार जब भी ईडी या कोई अन्य सरकारी एजेंसी किसी भ्रष्टाचारी के घर से कैश/गहने/जेवर बरामद करे तो उस कैश और काइंड में आग लगा देनी चाहिए?

अब कुछ लोग यह कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार की इस जीती जागती मीनार को ध्वस्त करने से बाकी बिल्डरों को सबक मिलेगा ।

लेकिन मेरा मानना यह है कि इस बिल्डिंग को ध्वस्त करने के बजाए-

  1. सरकार इसे अपने कब्जे में ले लेती और अस्पताल या किसी अन्य सामाजिक कार्य के लिए उपयोग करती।
  2. जिन लोगों ने फ्लैट खरीदने के लिए पैसे दे दिए हैं उनको इस बिल्डिंग में रहने दिया जाता। लेकिन इस बिल्डिंग का मालिकाना हक सुपरटेक से छीन लिया जाता और फ्लैट खरीदने वालों से लिए हुए पैसों का उपयोग सरकार किसी अन्य जनहित कार्य में करती ।
  3. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत यह फ्लैट आवंटित कर दिए जाते ।
  4. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सरकारी आवास की भारी कमी के कारण हजारों सरकारी कर्मचारी, अर्धसैनिक बल, सेना के जवान किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं । यह बिल्डिंग सरकार द्वारा अधिग्रहीत कर इस कार्य के लिए भी उपयोग की जा सकती थी।
  5. इस ट्विन टावर के कानूनी दांवपेंच में फंसने के कारण हुए नुकसान की भरपाई जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की चल अचल संपत्ति बेचकर की जाती। अगर वास्तव में Deterrance (उदाहरण, नजीर) ही स्थापित करना था तो फिर: इस बिल्डिंग के साथ उन सभी लोगों को भी बांधकर विस्फोट किया जाता जिनके लोभ और लापरवाही के कारण भ्रष्टाचार का यह हिमालय बनकर खड़ा हुआ है।

हालांकि यह कुछ ज्यादा कठोर, अव्यावहारिक और आसमानी किताब वाला न्याय होता।

लेकिन भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अनुसार तथा बुलडोजर बाबा के राज में इस ट्विन टावर को ढहाने के साथ ही सभी जिम्मेदार कर्मचारियों और अधिकारियों के घर पर बुलडोजर तो चलाया ही जा सकता था।

तब वास्तविक न्याय और deterrence होता।

(विनय सिंह बैस)