कोरोना के कारण नमस्ते-नमस्ते, नमस्ते इण्डिया !

महेन्द्र नाथ महर्षि (से.नि. वरिष्ठ अधिकारी दूरदर्शन)-

कभी नहीं सोचा होगा कि बुराई की भी ‘धूम’ मच सकती है। कभी उम्मीद की है कि एक रोगाणु आएगा और संगीत का अंतरराष्ट्रीय विषय बन कर विभिन्न देशों में गाया जाने लगेगा ?

पिछले कुछ हफ़्तों में कोरोना उभरा फिर उसका नामकरण भी हुआ ताकि पहचान बनी रहे। अब यह ‘कोविद-19 ‘ के नाम से तब तक शोध का विषय रहेगा जब तक इससे लड़ने की कारगर दवा नहीं मिल जाती है।

कोरोना वायरस वायरलेस की तरह से धरा-धर्म की हर सीमा लांघ कर सार्वजनिक रूप में ‘सार्वभौमिक’ हो गया है। धरती वास्तव में एक गाँव है,अब यह सिद्ध हो रहा है। हमारे यहाँ तो हज़ारों वर्ष पहले ही कह दिया था कि “सबै भूमि गोपाल की”, “वसुधैव कुटुम्बकम” । यहाँ कोई पासपोर्ट-परमिट लागू नहीं होता। वायरस का जहां मन रमा वहीं निकल लिया। इसकी ताक़त तो देखिए दुनिया की दौलत बिखर गई , तेल डूब गया, और रिश्ते नमस्ते करने लगे।अच्छे अच्छों को उस नमस्कार का महत्व मालूम हो गया है जो भारत में परंपरागत रूप से युगों पहले से प्रचलित है।

भारतीय अभिवादन के कई मानकीकृत तरीक़े हैं। प्रणाम, साष्टांग नमस्कार या प्रणाम, चरणस्पर्ष भारतीय अभिवादन के प्राचीन तरीक़े हैं। प्रणाम हाथ जोड़कर कब किया जा सकता है, उसमें मिलने पर पहला संबोधन क्या होता है, यह परिस्थिति जन्य होता है। विनय पूर्वक प्रार्थना के तरीक़े में हाथ जोड़ ,कमर से थोड़ा आगे झुकके भी प्रणाम करते हैं। पद में बड़े हों या उम्र में, संत हों या देवी रूपिणी बालिका, चरण पूजा या चरण स्पर्श से उनका आदर भी प्रणाम का एक अन्य तरीक़ा है। साष्टांग प्रणाम मंदिर में स्थापित पूज्य मूर्ति, गुरूदेव आदि के प्रति कृतज्ञता रूप में की जाने वाली अभिव्यक्ति है।यह हिन्दू समाज में प्रमुखता से मान्य है।

भारत में इस्लाम की मान्यताओं को भी यथोचित आदर दिया जाता है। ‘सलाम वालेकम, वालेकम सलाम’, में हाथ नहीं जोड़े जाते। दाहिने हाथ को माथे की ओर ले जाते हुए अभिवादन होता है और स्वीकार किया जाता है। बादशाही के दौर में कमर को आगे की तरफ़ लगभग दुहरा झुकाकर दाहिने हाथ को बार बार सलाम करते हुए आदर प्रकट किया जाता है। इसमें हुज़ूर की इनायत वाली ग़ुलामी की मानसिकता की स्थिति ज़्यादा झलकती है जो बादशाह सलामत के रहम की बेबात में की गई गुहार जैसी लगती है। यह बादशाही दौर में दरबारी मानसिकता की ज़रूरी ज़रूरत भी थी वर्ना पल भर में ग़ुस्ताख़ी का फ़रमान बन्दे की ज़िन्दगी को इस तरफ़ से उस तरफ़ ढकेल सकता था।

यूरोपीय सत्ता के भारत आगमन पर अभिवादन और अभिनन्दन के तरीक़ों में कुछ बदलाव और इज़ाफ़ा हुआ। हाथ जोड़ने की जगह हाथ मिलाने की नई परंपरा जुड़ गई। अंग्रेजों ने अभिवादन में भी भेदभाव को नया कोण बना दिया। रोयल्टी , कोहनी तक के दस्ताने पहन हाथ मिलाने की औपचारिकता से बचने की विधि से अपनी अलग पहचान बनाए रखती थी। ब्रिटिश राजघराने में यह आज तक जारी है।

कोरोना के इस दौर में बड़े बड़ों ने, भारत की हाथ जोड़ अभिवादन परंपरा के वैज्ञानिक सोच का महत्व समझा है।

“दुराचारी वायरस कोविद-19 जी”, आपको हमारा हाथ जोड़ कर प्रणाम। आप कब विदा होंगे ? नमस्ते-नमस्ते अब जाइए। नमस्कार!!