यह बाज़ार नहीं, महब्बत का पाक मन्दिर है
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उनकी निगाहों के सुरूर१ अब बोलने लगे,वे कितने पानी में हैं, लोग अब तोलने लगे।वे आर्ज़ूमन्द२ हैं, मताए दिल३ ख़ुशगवार रहे,बेशक, डर है, ईमान कहीं अब डोलने लगे।चलो! एक बार […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उनकी निगाहों के सुरूर१ अब बोलने लगे,वे कितने पानी में हैं, लोग अब तोलने लगे।वे आर्ज़ूमन्द२ हैं, मताए दिल३ ख़ुशगवार रहे,बेशक, डर है, ईमान कहीं अब डोलने लगे।चलो! एक बार […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद अँधेरा ग़र बढ़ा तो जुगनूं टिमटिमाने लगे, जिन्हें रौशनी से डर था वो भी मुस्कुराने लगे। एक मुक़म्मल दिया को न जलता देख कर, लोग जुगनूं की हैसियत को आजमाने लगे। फ़िक्र […]