जिन्हें रौशनी से डर था वो भी मुस्कुराने लगे

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

अँधेरा ग़र बढ़ा तो जुगनूं टिमटिमाने लगे,
जिन्हें रौशनी से डर था वो भी मुस्कुराने लगे।
एक मुक़म्मल दिया को न जलता देख कर,
लोग जुगनूं की हैसियत को आजमाने लगे।
फ़िक्र थी तुझे ‘जगन’ जहां की रोशनी की,
लोग तेरे एहसास पर ही तरस खाने लगे।
सोचा इक चराग़ ही जला दूं मोहब्बत का ‘जगन’
जिससे कुछ चेहरों का नक़ाब नज़र आने लगे।
मुझमें जज़्बातों के सिवा कुछ और था ही नहीं,
ये चिंगारी काफी न थी कि शहर जगमगाने लगे।