‘धर्म’ और ‘मज़हब’ के दो विद्रूप चेहरे
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश पल रहा है तुम्हारी कोख में उसे न तो ‘राम’ की माला पहनाना और न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़। उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान, जिसका […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश पल रहा है तुम्हारी कोख में उसे न तो ‘राम’ की माला पहनाना और न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़। उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान, जिसका […]