‘हिन्दी-दिवस’ के अवसर पर ‘सर्जनपीठ’ और साहित्यांजलि प्रज्योदि’, प्रयागराज के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘राजभाषा के नाम पर हिन्दी का अपमान’ विषयक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज में किया गया।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने शासकीय-अशासकीय प्रतिष्ठानों के राजभाषा- अधिकारियों की दायित्वविहीन भूमिका पर प्रश्न खड़े करते हुए कहा, “संविधान के पन्नों पर हिन्दी को राजभाषा के रूप में पढ़ना अच्छा लगता है, जबकि व्यवहार में लगभग समस्त कार्यालयों में राजभाषा के रूप में अँगरेज़ी ही दिख रही है। बैंकों, रेलवे, वायुयानकेन्द्रों आदिक कार्यालयों में हिन्दी की उपेक्षा जारी है और सरकार मौन है।”
साहित्यकार प्रदीप चित्रांशी ने बताया, प्रादेशिक भाषा से प्रेम तो ठीक है; परन्तु राजभाषा हिन्दी का अपमान तो मत कीजिए। महात्मा गांधी ने कहा था– मातृभाषा के ज़रिये ही व्यक्ति श्रेष्ठ चिन्तन कर सकता है।”
“वरिष्ठ पत्रकार सुधीर अग्निहोत्री ने कहा,”राजभाषा के रूप में हिन्दी को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है। हिन्दी शुरू से ही भेद-भाव का शिकार रही है। अब यह स्थिति बदलनी चाहिए।”
प्रकाशक आलोक चतुर्वेदी ने कहा, “राजभाषा के रूप में हिन्दी अब सम्पूर्ण देश में फैल चुकी है। इसके लिए हिन्दी-प्रेमियों ने अथक प्रयास किये हैं।”
कार्यक्रम में ज्योति चित्रांशी की विशेष भूमिका रही।