कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

निजी स्वार्थलिप्सा का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है “अवरीयता”

आइए जानते हैं अवरीयता के प्रमुख लक्षणों को ताकि आप-हम अपने वास्तविक व्यक्तित्व को जान व समझ सकें।

मौजूदा धूर्त कुराजनीति के “निजी स्वार्थ” से शायद ही कोई अछूता हो! फिर भी जिन्हें लगता है वे नही हैं तो उनके लिए ये आर्टिकल अतिमहत्त्वपूर्ण है।
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निजी स्वार्थलिप्सा का सबसे महत्वपूर्ण कारण है “अवरीयता” (Ineligibility):
आइए जानते हैं अवरीयता के प्रमुख लक्षणों को ताकि आप-हम अपने वास्तविक व्यक्तित्व को जान व समझ सकें।

अवरीय व्यक्तियों के लक्षण (Characteristics of Ineligible Persons) :-
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अपनी चारों क्षमताओं क्रियाशक्ति (PQ), विचारशक्ति (IQ), भावशक्ति (EQ), चिद्शक्ति (SQ) का दुरूपयोग करने वाले व्यक्ति अवरीय एवं अपात्र होते हैं।
मानवीय समाज में इनका प्रवेश एवं निवास निषिद्ध होता है।
अतः ये परित्याज्य माने जाते हैं।
ये किसी भी शुभ कर्म-पद-सम्पदा के स्वामित्व हेतु असमर्थ एवं अपात्र होते हैं।
इन्हें अन्त्यज, बहिष्कृत, निष्कासित कहा जाता है।
ये आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं।
अवसर मिलते ही ये अपराध कर बैठते हैं।
केवल भय के द्वारा ही ये नियंत्रित रहते हैं।
ऐसे अवरीय एवं अपात्र व्यक्तियों के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।
ये इन लक्षणों द्वारा ही इन अवरीय व्यक्तियों की पहचान सरलतापूर्वक की जा सकती है :-
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1◆ विक्षिप्तता (Madness) :-
इनके विवेक पर विक्षेप की छाया होती है।
विवेकरूपी सूर्य विक्षेपरूपी बादलों से आच्छादित होने के कारण इनकी चेतना का प्रकाश ढक जाता है।
बुद्धिमान होते हुए भी इनमें बुद्धिहीनता एवं पशुता के लक्षण दिखाई देते हैं।
दोषयुक्त होने के कारण इनके कर्म दुष्कर्म हो जाते हैं, विचार दुर्विचार हो जाते हैं, भाव दुर्भाव हो जाते हैं, चेतना दुष्चेतना हो जाती है।
दुर्विक्षेप की छाया जैसे-जैसे गहन होती जाती है, वैसे-वैसे बुद्धि का प्रकाश क्षीण होता जाता है।
अतः इनकी आत्मा पर इनकी आदत का शासन प्रतिष्ठित हो जाता है।
ये अपनी आदतों, चाहतों, इच्छाओं, आकांक्षाओं के दास हो जाते हैं।
ये किसी सैद्धान्तिक नियम, नीति, निर्णय का पालन नही कर पाते, अपने मान्यतावादी दृष्टिकोण पर ही टिके रहते हैं।
इनके हृदय में अनेक प्रकार की दुर्ग्रंथियाँ निर्मित हो जाती हैं।
दोषों, ग्रंथियों एवं विक्षेपों से ग्रस्त होने के कारण ही इनमें विक्षिप्तता के लक्षण पाए जाते हैं।

2◆ परजीविता (Paracitism) :-
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व्याजखोरी, चोरी, लूट, डकैती, धोखाधड़ी, हेराफेरी, जालसाजी, परपीड़न इत्यादि के द्वारा दूसरों की धनसम्पत्ति के अपहरण की इनमें प्रवृत्ति होती है।
ये स्वयं उपार्जनशील नही होते।
अतः अपहरणशीलता के द्वारा ही ये अपना जीवनयापन करते हैं।
दूसरों के द्वारा उपार्जित धनसम्पत्ति को दल, बल, छलपूर्वक छीनकर अपने अधीन कर लेते हैं और उसका दुरूपयोग और दुर्भोग करते हुए अनर्गल जीवन जीते हैं।
ये सिंह, श्रृगाल, भेड़िया, मगरमच्छ, घड़ियाल, सर्प, चमगादड़, उल्लू जैसे निशाचर प्रवृत्ति के प्राणी होते हैं।
ये जीवों को मारकर अपना पेट भरने का प्रयास करते हैं।
अपने से कमजोर का शिकार करके उसे भक्षण कर जाते हैं।
अजगरोदर होकर ये परभक्षण हेतु यहाँ-वहाँ विचरण करते रहते हैं अथवा कहीं गोपनीय स्थान पर घात लगाए बैठे रहते हैं।
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3◆ आक्रामकता (Aggressiveness) :-
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दूसरों के अधिकारक्षेत्र में बलात् प्रवेश ही आक्रमण कहलाता है।
दुर्बुद्धिवश दूसरों को स्वयं से भिन्न मानकर भय की अनुभूति करने के कारण आक्रामकता उत्पन्न होती है।
आत्मीयता एवं अपनत्व के अभाव में स्थित व्यक्ति ही आक्रामक होते हैं।
आक्रामकता भी अवरीयता का प्रमुख लक्षण है।
अतः ये स्वभाववश धूर्त एवं शिकारी प्रवृत्ति के होते हैं।
अपेक्षाकृत निर्बल एवं असावधान व्यक्तियों पर वे आक्रमण करते रहते हैं।
ये अपात्र होकर भी उच्चतर पदों पर दल, बल, छलपूर्वक कब्जा करने की कुचेष्ठा करते रहते हैं।
विना माँगे ही दूसरों को सलाह और आदेश देने को सदैव आतुर रहते हैं।
ये दूसरों की सहमति के विना ही उनके अधिकारक्षेत्र में प्रवेश करते हैं।

4◆ क्रूरता (Cruelty) :-
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दुर्बुद्धि के कारण दूसरों के साथ सम्बंध की अनुभूति नही होती।
सम्बन्धों की अनुभूति के विना ह्रदय में संवेदनशीलता उत्पन्न नही होती।
संवेदना की अनुपस्थिति में व्यक्ति क्रूर हो जाता है।
कुंठित भावनाओं में क्रूरता के लक्षण पाए जाते हैं।
क्रूर व्यक्तियों में दया, करुणा इत्यादि लक्षण नही पाए जाते।
इनके आचार-व्यवहार में कठोरता, क्रूरता एवं धूर्तता ही विद्यमान रहती है।
ये पररक्षक नही, परभक्षक होते हैं।
अत्यन्तिम क्रूर होने पर ये स्वयं को भी उत्पीड़ित करने लगते हैं।
क्रूरता के कारण ही इनमे मांसाहार की प्रवृत्ति अत्यंत प्रबल हो जाती है।
प्रेमजनित श्वेत दुग्ध इन्हें प्रिय नही लगता, बल्कि पीड़ाजनित लाल रक्त पीकर ये तृप्त होते हैं।
किसी के महान कष्ट पर भी ये द्रवित नही होते।
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5◆ हठधर्मिता (Obstinacy) :-
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दुर्जन लोग हठधर्मी होते हैं।
दुराग्रह अथवा जिद को ही ‘हठ’ कहते हैं।
हठी, दुराग्रही अथवा जिद्दी लोग अपनी गलत बातों पर भी अड़े रहते हैं।
इनमें सरलता, विनम्रता, उदारता, दयालुता, सेवापरायणता के लक्षण नही पाए जाते।
ये कठिन, जटिल एवं संकीर्ण प्रवृत्ति के होते हैं।
प्रायः असत् विचार पर ही इनकी निष्ठा होती है।
ज्ञान-विज्ञान द्वारा प्रमाणित सत्यात्मक सुतर्कों एवं सिद्धांतों से हटकर ये कुतर्कों, कल्पनाओं और मान्यताओं को ही महत्व देते हैं।
इनके स्वभाव में शठता, कठता, हठता निरंतर विद्यमान रहती है।
ये आत्मोद्धार के लिए हठयोग एवं आत्मनाश के लिए कल्याणयोग का मार्ग अपनाते हैं।
नशीले पदार्थों अथवा कुमद्य को ही कल्य कहते हैं।
‘कल्य’ का सेवन करने पर ही इन्हें ‘कल्याण’ प्राप्त होता है।

6◆ दुष्टता (Evilness) :-
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पाँचवें प्रकार के व्यक्ति दुष्ट होते हैं।
दोष भी पाँच प्रकार के होते हैं- दम्भ, द्वेष, ईर्ष्या, दस्युता, द्रोह।
इन पचंदोषों से ग्रस्त व्यक्ति ही ‘दुष्ट’ कहलाते हैं।
दुष्टों को ही ‘दुर्जन’ कहा जाता है।
मन में दुर्ज्ञान के कारण मानवीय स्वभाव दोषयुक्त हो जाता है अथवा दूषित संस्कृति में पलने, बढ़ने, रहने के कारण मनुष्यों के हृदय में पचंदोष प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
इन पचंदोषों को दुर्गुण भी कहा जाता है।
पचंदोषों की प्रेरणा से ही मनुष्यों में दुराचार एवं दुर्व्यवहार उत्पन्न होता है तथा दुराचार एवं दुर्व्यवहार से ही पचंदोषों की वृद्धि होती है।
पचंदोष से ग्रस्त होने पर व्यक्ति के कर्म दुष्कर्म हो जाते हैं, बुद्धि दुर्बुद्धि हो जाती है, मान्यताएँ दुरमान्यताएँ हो जाती हैं, आत्मा दुरात्मा हो जाती है।
दुष्टता को भी अवरीय का लक्षण माना जाता है।
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7◆ आपराधिकता (Criminality) :-

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दुष्ट लोग पंचअपराधों में ही प्रवृत्त रहते हैं।
अपराध पाँच प्रकार के होते हैं- अपमान, अपकार, अपहिंसा, अपहरण, अपबन्ध।
दम्भ, द्वेष, ईर्ष्या, दस्युता, द्रोह इत्यादि पचंदोषों की प्रेरणा से ही आपराधिक घटनाएँ होती हैं।
दुष्ट हुए विना कोई अपराधी नही हो सकता।
यदि सज्जनों द्वारा कोई अपराध हो, तो यही समझना चाहिए कि उन्होंने अपराध अनजाने में किया होगा अथवा विवश होकर किया होगा।
किन्तु दुर्जन लोग तो स्वाभाविक रूप से ही अपराधी होते हैं।
अतः आपराधिकता को अवरीय व्यक्तियों का प्रमुख लक्षण माना जाता है।

8◆ दैत्यता (Demonity) :-
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दुष्ट लोगों में सिंहों, भेड़ियों, श्रृगालों, मगरमच्छों, कोबरों जैसी कुहिंसात्मक पशुओं की प्रवृत्ति होती है।
मानवशरीर में ही ये दानव अथवा दैत्य होते हैं।
ये वास्तव में पशुतुल्य, असभ्य, जंगली एवं असामाजिक प्राणी होते हैं।
इनमें सामाजिक सभ्यता नही पायी जाती।
“जिओ और जीने दो” का न्यायशील उद्घोष इन्हें नही रुचता।
“मरो और मारो” -ऐसा उद्घोष ही इन्हें प्रिय लगता है।
ये परपीड़क होने के साथ-साथ स्वयं को भी उत्पीड़ित करते रहते हैं।
ये सदैव दुराचार एवं दुर्व्यवहार में संलग्न रहते हैं।
“सत्-सिद्धांत” को त्यागकर ये “दुष्-सिद्धांत” को अपना आधार मानते हैं।
दुर्नियम, दुर्नीति एवं दुर्निर्णय पर आधारित विषमतामूलक दुर्विधान इन्हें प्रिय लगता है।
ऐसे अन्यायपूर्ण जंगली विधान पर आधारित भयंकर जंगली सभ्यता ही इनका आदर्श होती है।
अपशब्द, कुशब्द, गाली, गलौज ही इनकी वाणी के आभूषण होते हैं।
इनकी दृष्टि वेधक होती है।
फूल के स्थान पर शूल ही इनका श्रृंगार होता है।
सहज हँसी एवं मुस्कान के स्थान पर ये अट्टहास करते हैं, अटक-अटक कर हँसते हैं।
ये वास्तव में कभी प्रसन्न और सुखी नही हो पाते, बल्कि सदैव खिन्न और दुखी रहते हैं।
नुकीली, शूलयुक्त घातक वस्तु, चित्र, संकेत ही इन्हें प्रिय लगते हैं।
द्वैतबुद्धि के कारण दूसरों से भयवश ये सदैव शंका, संदेह, संशय से घिरे रहते हैं।
ये किसी के भी वास्तविक मित्र नही बन पाते।
ये सबके प्रति अनिवार्यतः शत्रुता ही धारण किये रहते हैं।
अपने स्वार्थपूर्ति हेतु कूटनैतिक कारणों से ही ये पाखंडवश दूसरों की सहायता करते हैं।

9◆ अभावबोध (Scarcity Feeling) :-
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दुर्जनों में सदैव अभावबोध बना रहता है।
अतः ये संग्रही एवं अतिपरिग्रही होते हैं।
प्रत्येक मूल्यवान वस्तु पर ये सदैव अपना कब्जा जमाने को आतुर रहते हैं।
बहुत सी सम्पदाओं को एकत्रित करके भी ये असन्तुष्ट रहते हैं।
बहुत से दुर्भोगों को भोगते हुए भी ये अतृप्त रहते हैं।
सुखद वातावरण में भी ये दुखी एवं चिड़चिड़े रहते हैं।
सम्मानयुक्त स्थान पर भी ये अपमानित अनुभव करते हैं।
समृद्धि में भी दरिद्र जैसे संकीर्ण रहते हैं।
परमवैभव भी इनकी दीनता को समाप्त नही कर पाता।
सम्पत्तियों पर स्वामित्व के स्थान पर ये सम्पत्तियों के दास हो जाते हैं।
ये लक्ष्मी के अधिपति नही, बल्कि उल्लू की भाँति लक्ष्मी के वाहन हो जाते हैं।
सत्त्वगुण की अनुपस्थिति के कारण इन्हें किंचित भी प्रभुत्व, ईश्वरत्व, स्वामित्व की अनुभूति अथवा प्रभावबोध नही होता।
ये तमसाच्छादित होकर निरंतर अभावबोध से ग्रस्त बने रहते हैं।
सबकुछ प्राप्त होने पर भी इन्हें कुछ भी प्राप्त नही हो पाता।
संसार की सभी वस्तुओं, सम्पदाओं, व्यक्तियों पर ये अपना कब्जा व अधिपत्य जमाने की निरंतर चेष्ठा करते रहते हैं।
दूसरों को लूटकर ही स्वयं की समृद्धि सम्भव मानने के कारण ये दूसरों के साथ सदैव दुश्मनी या शत्रुता धारण किये रहते हैं।
दूसरों को लूटने, उनको अपने अधीन करने, उन्हें दास या गुलाम बनाने, उनके हिताधिकारों का नाश करने की ये सदैव चेष्ठा करते रहते हैं।
दुःख, भय, अपमान एवं बंधन में ये प्राकृतिक कारणों से पूर्णतः बंधे रहते हैं।
इनकी जीवनयात्रा में हर 100 योजन के पश्चात 100 योजन की दूरी शेष रह जाती है।
अतः ये जीवनोद्देश्य की पूर्ति कभी नही कर पाते।
इनके अधूरेपन का कभी अंत नही होता।
अभावबोध आजीवन इनका पीछा नही छोड़ता।

10◆ क्षमाहीनता (Non-Forgiveness) :-
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दुर्जन लोग क्षमाहीन होते हैं।
उनमें क्षमायाचना एवं क्षमादान की प्रवृत्ति नही होती।
स्वतः गलती करने पर वे किसी से सहज ही क्षमा नही माँगते और दूसरों की गलती पर उसे सहज ही क्षमा नही करते।
दूसरों द्वारा अनजाने में भी हुई त्रुटियों को वे बड़ी गंभीरता से लेते हैं और स्वयं के द्वारा जानबूझकर की गई बड़ी-बड़ी घटनाओं को भी वे बड़ी सहजता से लेते हैं कि जैसे उन्होंने कुछ भी गलत किया ही नही।
ये अपना इतिहास उजागर होने से डरते हैं, क्योंकि उसमें कुछ भी श्रेष्ठ नही होता।
ये सदैव अनावश्यक बदले की आग में झुलसते रहते हैं।
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11◆ म्लेक्षता (Dirtiness) :-
दुर्जन प्रवृत्ति के व्यक्ति मलिन इच्छा वाले होते हैं।
उनमें स्वच्छता का अभाव होता है।
इनके तन से, वस्त्रों से, वस्तुओं से दुर्गंध निकलती रहती है, क्योंकि ये अकर्मण्यतावश स्वच्छताप्रिय नही हो पाते।
मलिनता को ये आलस्यवश आभूषण की भाँति धारण किये रहते हैं, क्योंकि ये कर्मठ नही होते।
स्वच्छ बने रहने के लिए निरंतर कर्मठता आवश्यक होती है।
दुष्ट लोग कर्मठ नही, कामचोर होते हैं।
अतः इन्हें फलचोर भी होना पड़ता है, क्योंकि परिश्रमपूर्वक फलों का उपार्जन ये नही कर पाते।
विवश होकर ही कर्मशील होते हैं।
कर्म को कष्ट मानते हुए ये कहते हैं- “अजगर करे न चाकरी, पँछी करे न काम”
म्लेच्छता के कारण ये तमसोन्मुख होते हैं।
दूषित आचार-व्यवहार उनमें तमोगुण की वृद्धि करता है, जिससे अकर्मण्यता, श्रमहीनता, कुरूपता, अभद्रता, जड़ता, मूर्खता के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

12◆ दुर्विलासिता (Bad Lustness) :-
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दुर्जन लोग दुर्विलासी होते हैं।
कुमद्य, कुमैथुन, कुकौतुक, कुद्यूत, कुसंगीत ही उन्हें प्रिय लगता है।
मद्य, मैथुन, कौतुक, द्यूत, संगीत आदि पंचविलासों के कुत्सित स्वरूप का ही वे सेवन करते हैं।
पंचविलासों के सात्त्विक स्वरूप इन्हें आनंद की अनुभूति नही दे पाते।
अतः इन्हें सुविलास प्रिय नही लगता।
तामसिक, दूषित, मलिन, क्रूर, हिंसक, उत्पीड़क क्रियाओं एवं वस्तुओं में ही इन्हें आनंद की अनुभूति हो पाती है।
अत्यंत तीखे, कड़वे, विषाक्त, नशीले, मलिन, दूषित, कुरूप, वीभत्स, कष्टदायक पदार्थ ही इन्हें प्रिय होते हैं।
अतः दुर्विलासिता को भी अवरीय व्यक्तियों का प्रमुख लक्षण माना जाता है।
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13◆ पतनोन्मुखता (Downfallness) :-
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दुष्ट लोग पतनशील होते हैं।
जो कोई भी व्यक्ति दुष्पथ पर चलता है, वह स्वतः पतनोन्मुख हो जाता है।
अपने वर्तमान स्थान अथवा पद से च्युत होकर अधोगामी एवं पदावनत हो जाता है।
पतन का मूल कारण पंचमहापातकों का सेवन है।
नशा, कुत्सा, मांसाहार, व्याजखोरी एवं कुसंग ही पंचमहापातक हैं, जो मनुष्य को अधोपतित बनाते हैं।
मुफ्तखोरी ही व्याजखोरी है, जो इन्हें उपार्जन के स्थान पर अपहरण सिखाती है।
दूसरों से माँगकर, लूटकर, छीनकर खाना ही मुफ्तखोरी है।
इन पचंमहापातकों का सेवन करने वाले व्यक्ति पतित होकर गर्त में जा पहुँचते हैं।
सर्वोच्च वरीय पदों पर प्रतिष्ठित व्यक्ति भी यदि पंचमहापातकों का सेवन प्रारम्भ करे, तो वह भी धीरे-धीरे पतित होकर निम्नतम पद तक जा पहुँचता है।
दुर्जन लोग स्वाभाविक रूप से इन पंचमहापातकों की ओर आकर्षित होते हैं और पतन के मार्ग पर चल पड़ते हैं।

14◆ प्रतिद्वंद्विता (Rivalry) :-
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दुष्ट लोग द्वैतवृत्ति के कारण स्वभावतः प्रतिद्वंद्वी होते हैं।
दूसरों के साथ प्रतियोगिता (Competition) के स्थान पर इन्हें प्रतिद्वंद्विता (Rivalry) ही प्रिय होती है।
प्रतियोगिता इन्हें प्रिय नही होती, क्योंकि प्रतियोगिता में दूसरों को स्वीकारना एवं दूसरों से जुड़ना होता है।
जबकि प्रतिद्वंद्विता में दूसरों को तिरस्कृत करना, तोड़ना, कमजोर बनाना, दबाना एवं हराना होता है।
किन्तु प्रतियोगिता दूसरों को हराती नही, बल्कि दूसरों से मेल कराती है, मिलाती है।
प्रतियोगिता से विकास एवं प्रतिद्वंद्विता से विनाश होता है।
दुर्जन प्रवृत्ति के लोग दुर्ज्ञानग्रस्त होने के कारण सदैव द्वैतभाव से आच्छादित रहते हैं एवं दूसरों के लिए प्रतिद्वंद्वी हो जाते हैं।
सत्ज्ञान के अभाव में वे दूसरों को स्वयं से भिन्न मानकर द्वंद्वात्मक वृत्ति धारण करते हैं।
सम्पूर्ण संसार एक ही मौलिक तत्त्व से रचा होते हुए भी वे परस्पर एकात्मता के यथार्थबोध को धारण नही कर पाते।
अतः पारस्परिक सम्बन्धता के स्थान पर संघर्ष की द्वंद्वात्मक नीति ही अपनाते हैं।
प्रतिद्वंद्विता के कारण ही ये अपनी ऊँचाई की वृद्धि का सत्प्रयत्न करने के बजाय दूसरों की लंबाई को कम करने का दुष्प्रयत्न करते हैं।
जबकि सज्जन लोग प्रतियोगिता से प्रेरित होकर दूसरों की ऊँचाई के अनुरूप स्वयं के व्यक्तित्व का विकास उनसे संयुक्त होकर, जुड़कर एवं उन्ही के मार्गदर्शन में सरलतापूर्वक करने का प्रयत्न करते हैं।
दूसरों के कारण दुर्जनों को भय, दुःख, अपमान की गहन अनुभूति होती है।
दूसरों की मृत्यु पर ही अपने जीवन को सुरक्षित अनुभव करते हैं।
यद्यपि मूलतत्त्व अजर-अमर ही है।
किन्तु अज्ञानवश ये मृत्युभय से ग्रस्त रहते हैं और दूसरे को अपने सामने उपस्थित देखकर भयभीत हो जाते हैं और उसे मिटाने-मारने का निरंतर प्रयास करते हैं।
पर्याप्त बौद्धिक विकास के अभाव तथा कुसंस्कार से ग्रस्त होने के कारण ये आत्मा की सर्वव्यापकता के सत्य को जान, मान और जी नही पाते।
अतः दुर्जनों में प्रतिद्वंद्विता के लक्षण भी स्पष्ट रूप से विद्यमान रहता है।

15◆ विध्वंसात्मकता (Destructiveness) :-
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दुर्जनों में सृजन की सामर्थ्य नही होती।
वे मूलतः विध्वंसात्मक प्रवृत्ति के होते हैं।
सृजनात्मकता के लिए सद्गुणों की आवश्यकता होती है।
दुर्गुणों के द्वारा साहित्य, संगीत, कौशल, विज्ञान कुछ भी विकसित नही होता।
जैसे-जैसे दुर्गुण बढ़ता है, वैसे-वैसे सृजनात्मकता क्षीण होती चली जाती है।
इनमें कर्मठता, बुद्धिमत्ता, धैर्य एवं विवेक का अभाव होता है, जिसके विना सृजन सम्भव नही होता।
ये अकर्मण्यता, बुद्धिहीनता, अस्थिरता एवं विक्षिप्तता से ग्रस्त रहते हैं।
अतः सदैव उद्विग्न रहते हैं।
ये दम्भ, द्वैष, ईर्ष्या के वशीभूत होकर सुंदर रचनाओं को भी तोड़ते, फोड़ते, लूटते और नष्ट करते रहते हैं।
अकर्मण्य होने के कारण ये अकुशल हो जाते हैं।
अकुशलता इन्हें असफलता की ओर ले जाती है।
असफलता इन्हें निराशा, हताशा, उदासी, खिन्नता की ओर ले जाती है।
ये सफल, सुंदर, शुभ, सज्जन लोगों के समक्ष स्वयं को दीन, हीन, दुर्बल देखते हैं, तथा दुर्ज्ञानवश दोषयुक्त होकर ये “खीझी बिल्ली खम्भा नोचे” की कहावत चरितार्थ करते एवं विध्वंसात्मक हो जाते हैं।
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16◆ दुर्गतिशीलता (Downwardness) :-
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दुर्जन लोग दुर्गतिशील होते हैं।
वे दुराचार एवं दुर्व्यवहार करते हैं और अंततः दुर्दशा को प्राप्त हो जाते हैं।

ये सम्पूर्ण विश्व को अपनी मुट्ठी में कर लें, तो भी दोष, दरिद्रता, दुःख एवं दासता ही इनका अंतिम दुष्परिणाम एवं दुर्भाग्य सिद्ध होता है।
पचंदोषों से दरिद्रता,
दरिद्रता से दुःख,
दुःख से दासता उत्पन्न होती है।
दार्शनिक सत्ज्ञान के अभाव में ये शिक्षित होकर भी दुष्ट,
धनी होकर भी दरिद्र,
सुखी होकर भी दुःखी एवं
स्वामी होकर भी दास सिद्ध होते हैं।
दुष्प्रवृत्त लोग एक-दूसरे को दास बनाने में निरंतर संलग्न रहते हैं।
दासता एवं दैन्यता ही इन्हें विनाश की ओर ले जाती जाती है।
ये तमसोन्मुख हो जाते हैं।
धीरे-धीरे वे तमोगुण की ओर बढ़ते जाते हैं।
उनकी चेतना को तमोगुण धीरे-धीरे आच्छादित करता चला जाता है।
दोषों के कारण दुर्गुण बढ़ते हैं।
दुर्गुण तमस् की ओर ले जाते हैं।
इन्हें कालारंग, कालरात्रि एवं कलुषित वस्तुएँ अधिक प्रिय लगती हैं।
तामसिक भोजन ही इन्हें अधिक रुचता है।
राजसिक एवं सात्त्विक पदार्थ इन्हें अधिक आकर्षित नही करते।
पचंदोष इन्हें स्वयं ही तमस् की ओर घसीटकर ले जाते हैं।
दुर्जन लोग दुष्पथगामी होते हैं।
दुर्गति से ग्रस्त होकर दुष्कर्म करते एवं दुष्परिणाम भोगते हुए दुर्दशा को प्राप्त हो जाते हैं।


✍(राम गुप्ता, साधारण प्रचारक/कार्यकर्ता)
आम आदमी पार्टी, उत्तरप्रदेश