प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे ‘शिक्षक-दिवस की पूर्व-संध्या मे ‘शिक्षा-प्रशिक्षा और परीक्षा मे परिव्याप्त भ्रष्टाचार : उत्तरदायी कौन?’ विषयक एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन प्रयागराज से किया गया था, जिसमे देश के शिक्षा और साहित्य-जगत् से जुड़े प्रबुद्धजन की प्रभावकारी सहभागिता रही।

आर्यकन्या डिग्री कॉलेज, प्रयागराज की सहायक प्राध्यापक डॉ० मुदिता तिवारी ने कहा– भ्रष्टाचार के मूल मे धन और शक्ति की महत्त्वाकांक्षा है। कई बार सरकारी दबाव और उच्चाधिकारियों का भय भी कारक तत्त्व होता है। प्रतिभा की जगह यदि अन्य कारक नियुक्तियोँ मे प्रभावी हो जाये तो भ्रष्टाचार पैर पसार लेता है।
रायबरेली से साहित्यकार आरती जायसवाल ने कहा– आज शिक्षा ग्रहण करने का उद्देश्य सीखना न होकर, येन-केन-प्रकारेण अधिक-से अधिकतर अंक लाना रह गया है। हमे समझना होगा कि किसी परीक्षा का प्राप्तांक विद्यार्थी के पूरे जीवन और गुणो का आकलन नहीँ होता।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– जिस देश के शिक्षालयोँ मे विद्यार्थियोँ को निश्शुल्क दिये जानेवाली भोजननीति भ्रष्ट हो, उसपर सम्बन्धित विभाग ध्यान क्योँ नहीँ देते? जाने कितने विद्यालय ऐसे हैँ, जो जर्जर अवस्था को प्राप्त कर चुके हैँ; परन्तु जब सम्बन्धित राज्य-सरकारोँ और विभागोँ की चेतनाशून्यता को जाग्रत् करने के लिए उस ‘सच’ को दिखाया जाता है तब सरकारेँ उसे अपराध मान लेती हैँ। क्या सच को उजाकर करना अपराध है?
हरदोई से शिक्षक डॉ० राघवेन्द्रकुमार त्रिपाठी ‘राघव’ ने कहा– शिक्षा अर्जित करने की एक कला है, जो विद्या का रूप है एवं विद्या मुक्ति का आधार है। भोगने की लालसा सबमे है :– व्यक्ति, संस्था तथा नियामक; अस्तु सभी उत्तरदायी हैँ।
कानपुर विद्यामन्दिर महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय की सहायक आचार्य डॉ० सोनम सिँह ने बताया– अँगरेज़ी मानसिकता, भाषायी भेद तथा वर्गभेद से ग्रस्त शिक्षाविद् भी योग्य शिक्षार्थियों के साथ अन्याय कर जाते हैँ।
प्राथमिक पाठशाला, आगरा की सहायक अध्यापक राजश्री यादव ने कहा– शिक्षा-प्रशिक्षा और परीक्षा मे परिव्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए सभी बोर्ड समाप्त कर, केवल एक सेण्ट्रल बोर्ड होना चाहिए।