‘शिक्षक-दिवस’ (५ सितम्बर) के अवसर पर विशेष आलेख
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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आज देश के लगभग समस्त राज्योँ मे छात्र-छात्राओँ मे जिसप्रकार का क्षोभ, आक्रोश तथा रोष दिखने लगा है और उसकी प्रतिक्रिया सामने आने लगी है, उससे एक बात तो साफ़ हो चुकी है कि जो सरकार दबा, डरा-धमकाकर उन्हेँ नियन्त्रित करती आ रही थी, वह नियन्त्रण अब पूरी तरह से शिथिल हो चुका है, जिसके मूल मे ‘जन्तर-मन्तर’ से निकली तस्वीरेँ रहीँ :– एक अलग ही प्रकार का जज़्बा और “करो वा मरो” की ललकार। यही कारण है कि आज ‘जेन अल्फा’ कहलानेवाली छात्र-छात्राएँ पाठशाला से विद्यालय तक मे व्याप्त असुविधाएँ और संसाधनाभाव को दूर कराने के लिए कृतसंकल्प हैँ। वे पुलिस और ज़िला-प्रशासन के साथ भी “दो-दो हाथ” करने के लिए पूर्णत: तत्पर दिख रहे हैँ। उन सबमे एक अलग ही प्रकार का जोश है, जिसमे कुव्यवस्था को मिटाने की ललक और ताक़त है।
आज देश के प्रत्येक शैक्षणिक संस्था और संस्थान मे शिक्षा, परीक्षा, परीक्षण, मूल्यांकन, परीक्षा-परिणाम तथा नियुक्ति का स्तर इतना पतित हो चुका है कि उससे देश की प्रत्येक छात्र-छात्रा उद्वेलित है। उसे अपना भविष्य अन्धकारमय दिखने लगा है। ऐसे मे “इस वा उस पार” की लड़ाई मे सब एकसाथ कूद पड़े हैँ। अब उन्हेँ पारदर्शी नेतृत्व भी प्राप्त होना प्रारम्भ हो चुका है। यहाँ तककि माता-पिता और अभिभावक भी समझ चुके हैं कि जब तक उनकी सत्य की लड़ाई ‘सड़क से संसद्’ तक नहीँ पहुँचती तबतक उनके पक्ष मे कोई प्रतिक्रिया आनेवाली नहीँ है।
एक वह भी काल था, जब अध्यापक की सम्पूर्ण समाज मे सर्वाधिक मान-प्रतिष्ठा हुआ करती थी, तब यह उदात्त शब्दावली शोभा देती थी, “आचार्य देवो भव।” एक आज का काल है, जब अध्यापक समाज की दृष्टि मे पतित होता आ रहा है। उस परिधि मे अध्यापक-अध्यापिकाओँ का वह वर्ग भी आता है, जो मेधासम्पन्न और अनुशासित है तथा आत्माभिमान से युक्त भी; परन्तु व्यवस्था के अत्याचार के विरुद्ध स्वर उठाने मे अक्षम, असमर्थ, लाचार तथा विवश है। ऐसे कुण्ठित लोग भी उन्हीँ आपराधिक कृत्योँ का एक उपयोगी उपकरण बनकर रह जाते हैं और गर्व से कहते हैँ– हम तो कर्त्तव्यपरायण हैँ; हम तो योग्य हैँ; हम उनमे से नहीँ, जो और लोग हैँ। धिक्कार है, उनकी नपुंसक कर्त्तव्यपरायणता और योग्यता को, जो मात्र अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए परोक्षत: अन्याय का एक हिस्सा बने हुए हैँ।
‘कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय’ की ऐतिहासिक जघन्य घटना ने इस स्थिति को समाजपटल पर सुस्पष्ट कर दिया है कि मात्र अध्यापक बनने के लिए व्यक्ति ‘महापाप’ तक कर सकता है। ऐसे चरित्रहीन लोग अपने विद्यार्थियोँ के अन्त:करण मे कौन-सा जीवनमूल्य और संस्कार आरोपित करेँगे, इन्हेँ आसानी से समझा जा सकता है। छद्म शैक्षिक प्रमाणपत्रोँ के सहारे अध्यापक बननेवाले क्या कभी किसी समाज के लिए ‘श्रद्धेय’/ ‘आदरणीय’ हो सकते हैं? दो टूक उत्तर है– कदापि नहीँ।
ऐसी स्थिति तब आती है, जब अध्यापक अपने कर्त्तव्य से च्युत होता लक्षित होता है। एक बहुत बड़ी संख्या ऐसी ही अध्यापक-अध्यापिकाओँ की है, जो वास्तव मे, नितान्त अयोग्य हैँ। ऐसे लोग ‘रिश्वत’ और ‘पहुँच’ के बल पर शैक्षिक उपाधियाँ (डिग्रियाँ) ख़रीद लेते हैँ; बटोर लेते हैँ और जो वास्तव मे, योग्य होते हैँ, उनके सीने पर मूँग दलते हुए, अपने अकर्मण्य होने का परिचय देते रहते हैँ। इस वास्तविकता को यदि समझना हो तो उत्तरप्रदेश के किसी ज़िले के किसी शासकीय प्राथमिक-माध्यमिक शाला मे पहुँच जाइए। वहाँ अध्यापक-अध्यापिका के नाम पर अधिकतर ऐसे चेहरे मिल जायेँगे, जो शैक्षिक अभियोग्यता के नाम पर शिक्षा-जगत् को कलंकित करते आ रहे हैं और वहीँ पर ऐसे सुयोग्य अध्यापक-अध्यापिकाएँ भी हैं, जो मनसा-वाचा-कर्मणा शिक्षणशालाओँ मे अध्ययनरत विद्यार्थियोँ के भविष्य सँवारने मे लगे हैँ; परन्तु पतित व्यवस्था का एक अंग बनकर।
अध्यापक के नाम पर हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट कॉलेजोँ मे पढ़ानेवालोँ मे ऐसे लोग भी हैँ, जो भरपूर वेतन पाते हैँ, उसके बाद भी मानसिक स्तर पर दरिद्र बने रहते हैँ और अपने मूल कार्य से विरत रहकर ‘कोचिंग संस्थाओँ ‘ में मुँह मारते रहते हैँ। वे ‘फेल’ करने का भय दिखाकर विद्यार्थियोँ को अपनी कोचिंग संस्था में आने के लिए बहलाते, फुसलाते तथा धमकाते हैँ। इतना ही नहीं, विद्यार्थियों के अध्ययन-स्तर चौपट करने के लिए गाइड के नाम पर ‘सड़कछाप’ प्रश्नोत्तरी लिखते आ रहे हैँ। वैसी मानसिकतावाले अध्यापक-अध्यापिकाएँ वही हैँ, जो बोर्ड की परीक्षाओँ के समय उत्तरपुस्तिकाओँ का परीक्षण और मूल्यांकन करते समय अधिक-से-अधिक उत्तरपुस्तिकाओँ का परीक्षण कर, रुपये बनाने के लिए भरपूर लापरवाही के साथ परीक्षक की कुभूमिका का निर्वहण करते हैँ। इतना ही नहीँ, प्रायोगिक परीक्षाओँ मे ले-देकर चलते बनते हैँ।
विश्वविद्यालयोँ और संघटक महाविद्यालयोँ के एक सामान्य अध्यापक से लेकर प्रधानाचार्य और कुलपतियोँ तक मे अधिकतर ऐसे लोग हैँ, जिनके शर्मनाक आचरण से शिक्षा की गरिमा कलंकित होती आ रही है, जिसे हम प्रतिदिन मीडिया के माध्यम से देखते, सुनते और पढ़ते आ रहे हैँ। स्वार्थ और परिचय-पहुँचवाद मे आकण्ठ डूबे ऐसे लोग, जिस कार्य के लिए नियुक्त किये जाते हैं, उसके प्रति न्याय नहीँ कर पाते; बल्कि अपने चेहरे पर कभी न मिटनेवाली कालिख़ जाने-अनजाने लगा लेते हैँ।
दु:ख और शोचनीय विषय यह है कि देश मे एक भी कुलपति ऐसा नहीँ है, जिसने किसी अध्यापक वा अध्यापिका को मूल कर्म ‘अध्यापन’ में लापरवाही बरतने के लिए कभी दण्डित किया हो। क्या कारण है कि किसी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय मे क्रमश: नये कुलपति और प्रधानाचार्य के आते ही अध्यापक-अध्यापिकाओँ और अध्यापकेतर कर्मचारियोँ के दो वर्ग बन जाते हैं :– एक वर्ग कुलपति और प्रधानाचार्य का चहेता-चहेती बन जाता है और दूजा कुलपति-विरोधी। यहीँ से विश्वविद्यालयोँ और महाविद्यालयोँ के शेष रहे अनुशासन की उलटी गिनती शुरू हो जाती है। ऐसे मे, कुलपतियोँ और प्रधानाचार्योँ की एक आँख फूटी रह जाती है; वह ‘एकाक्षी’ रहकर व्यवस्था को देख रह जाता है।
बहुसंख्य विश्वविद्यालय ऐसे हैँ, जहाँ कुलपति और कुलसचिव मे मुठभेड़ होती रहती है, ऐसा क्योँ? अधिकतर कुलपति कुछ महाविद्यालयोँ के प्रधानाचार्योँ की चमचागिरी से इतने प्रभावित रहते हैँ कि उनकी सेवानिवृत्ति की अवधि के बाद भी सेवा-विस्तार कर देते हैँ। बहुत सारी विसंगति हैँ, जो कुलपति और प्रधानाचार्य के पतित आचरण की पटकथा लिखती आ रही हैँ।
वर्ष मे विश्वविद्यालयोँ और महाविद्यालयोँ की अध्यापक-अध्यापिकाएँ कितने महीने अपनी-अपनी कक्षा मे आकर विद्यार्थियोँ को पढ़ाती हैँ? वे सब वर्ष मे कितने माह सम्मेलन-समारोहोँ समितियोँ की शोभा बढ़ाकर विद्यार्थियों के अध्यापन-कार्य की अवधि मे डाका डाल कर, अपनी जेबेँ भारी करते हैँ ? वे अपनी अयोग्यता के बावुजूद चयन-समितियोँ के पदाधिकारी, सदस्य आदिक कैसे और क्यों बन जाते हैँ? उन्हीँ मे से ऐसे भी हैँ,, जो कोचिंग-संस्थाओँ मे स्नातक-स्नातकोत्तर तथा प्रतियोगितात्मक विद्यार्थियोँ को पढ़ाते हैँ। निजी महाविद्यालयोँ मे परीक्षाओँ की अवधि मे ‘उड़न दस्ता’ के सदस्य बनने के लिए ऐसे ही लोग सिफ़ारिशेँ कराते हैँ और वहाँ पहुँचकर ‘मोटी रक़्म’ (रक़म/रकम अशुद्ध है।) पर हाथ साफ़कर नक़्ल को परवान चढ़ने देते हैँ। इस तरह से शिक्षामन्दिर का बाज़ारीकरण करनेवाले ऐसे बाज़ारू अध्यापक-अध्यापिकाएँ वर्णनातीत घृणा के पात्र हैँ।
बेशक, निष्ठावान अध्यापक के साथ यही चरितार्थ होता है :– ”एक मरी मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है।”
‘शिक्षक-दिवस’ के अवसर पर हमारा प्रश्न है– ऐसे अध्यापक और अध्यापिकाएँ जब नितान्त निन्दनीय और जघन्य कर्म करते है तब उनका अन्त:करण धिक्कारता क्योँ नहीँ?
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