● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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इलाहाबाद मे तंग गली-दर-गली मे साँस लेनेवाला मुहल्ला (‘मोहल्ला’ अशुद्ध है।) ‘अतरसुइया’ का जितना पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व है उतना ही साहित्यिक भी। चूँकि आज (४ सितम्बर) एक ऐसे हस्ताक्षर का निधन-दिनांक है, जो साहित्य और पत्रकारिता मे वह सब अर्जित कर चुका था, जो उसकी आकांक्षा रही; अन्तत:, वह अतरसुइया की एक गली मे किरायेदार के रूप मे रहते-रहते, जाने-अनजाने (‘अंजाने’ अशुद्ध है।) एक ऐसा गुनाह कर बैठा, जिसका उसे भान तक नहीँ था और जब भान हुआ तब एक काल्पनिक मन्दिर बनाकर उसमे ‘गुनाहों का देवता’ की मूर्ति स्थापित कर दी थी।
२५ दिसम्बर, १९२६ ईसवी को अतरसुइया, इलाहाबाद मे पिता चिरंजीवलाल वर्मा के घर मे जन्म लेनेवाला एक शिशु किस तरह से वय-वार्द्धक्य के साथ देश का एक महान् साहित्यकार और पत्रकार के रूप मे रेखांकित होता रहा, वह विश्लेषण का विषय बन जाता है।
धर्मवीर भारती ही थे, जिन्होँने अपने अव्यक्त प्रेम की शक्त (‘सशक्त’ अशुद्ध है।)वर्ज्य रेखा खीँचकर अपने को एक ऐसे देवता की कोटि के अन्तर्गत ला खड़ा किया, जो ‘गुनाह’ करता रहा, फिर भी ‘देवता’ बना रहा।
ऐसे सारस्वत हस्ताक्षर की शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद मे हुई थी, जिनमे अध्ययन के प्रति इतनी रुचि थी कि वे अपने मुहल्ले के ही ‘हरिभवन पुस्तकालय’ मे नियमित रूप से पुस्तकेँ पढ़ते रहे, जिसका मुख्य कारण था, आर्थिक अभाव से ग्रस्त उनका परिवार। वहीँ के डी० ए० वी० हाईस्कूल से उन्होँने अपनी आरम्भिक शिक्षा अर्जित की थी। वे आठवीँ कक्षा मे थे, तभी सिर पर से पिता का साया उठ चला था। इलाहाबाद मे रहनेवाले उनके मामा अभयकृष्ण जौहरी ने उन्हेँ अपना संरक्षण देते हुए, कायस्थ पाठशाला इण्टर कॉलेज से इण्टरमीडिएट की शिक्षा करायी थी। डॉ० भारती का मन-प्राण क्रान्तिकारिता से ओत-प्रोत था; क्योँकि उस समय के पराधीन देश का वातावरण था ही ऐसा। उन्होँने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन मे भाग लिया था, जिसके कारण उनका एक वर्ष प्रभावित हुआ था। उन्होँने स्नातक और स्नातकोत्तर की परीक्षाएँ इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की थीँ। उन्हेँ स्नातक की परीक्षा मे सर्वाधिक अंक अर्जित करने के कारण ‘चिन्तामणि घोष मेडल’ प्रदान किया गया था। उन्होँने डॉ० धीरेन्द्र वर्मा के निर्देशन मे ‘सिद्ध-साहित्य’ पर अपनी पीएच्० डी० (पीएच. डी., पी-एच. डी., पीएच० डी० और पी-एच० डी० अशुद्ध हैँ।) भी पूरी की थी। वे वही डॉ० धीरेन्द्र वर्मा थे, जिन्होँने मात्र पाँच विद्यार्थियोँ को लेकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे हिन्दी-विभाग का प्रारम्भ कराया था। संयोग ऐसा रहा कि डॉ० भारती उसी विश्वविद्यालय मे हिन्दी का अध्यापन भी करने लगे थे। वहीँ उन्होँने हिन्दीसाहित्य-कोश के कार्य मे अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया था। उन्होँने ‘निकष’ और ‘आलोचना’ पत्रिकाओँ का सम्पादन भी किया था। उनका जुड़ाव वहीँ की एक प्रसिद्ध संस्था ‘परिमल’ के साथ भी था, जिससे उनकी सर्जनात्मक मेधा को धार मिल चुकी थी। ‘परिमल’ मे मलयज, डॉ० रघुवंश, डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ० जगदीश गुप्त, लक्ष्मीकान्त वर्मा, अमृत राय, अमरकान्त इत्यादिक साहित्यकार सम्मिलित थे। वे सारे साहित्यकार इलाहाबाद ही नहीँ, देश की सारस्वत विभूति के रूप मे आज भी प्रतिष्ठित हैँ।
डॉ० भारती के भीतर ‘साहित्य और पत्रकारिता’ का मनोरम संगम था। यही कारण था कि वे इलाहाबाद से ही प्रकाशित ‘अभ्युदय’ समाचारपत्र मे उसके सम्पादक पद्मकान्त मालवीय के सान्निध्य मे अंशकालीन कार्य करने लगे थे। उसके बाद इलाचन्द जोशी के सम्पादन मे प्रकाशित ‘संगम’ पत्रिका के सहकारी सम्पादक बनाये गये थे। उन्होँने ‘हिन्दुस्तानी एकेडमी’ मे उपसचिव के पद पर भी कार्य किया था। वे सारे कार्य ऐसे थे, जो उनके भीतर के आर्थिक और सामाजिक दारुण को अपनी पराकाष्ठा तक पहुँचने नहीँ दिये। वे व्यक्तिगत रूप से घर-घर जाकर शिक्षणकर्म भी करते रहे, जिससेकि उनका आर्थिक पक्ष चीख़कर उन्हेँ अपने होने का एहसास न कराये।
डॉ० भारती को यहीँ से साहित्यिक संस्कार मिला, जिसने ‘गुनाहोँ का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ का सर्जन कराया। इलाहाबाद के कर्नलगंज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, सिविललाइन्स इत्यादिक मुहल्ले ‘गुनाहों का देवता’ के साक्षी बनते रहे, जिसकी आधारभूमि अतरसुइया ही रही।
जब वे अपने प्रेम को सँभालने और अव्यक्त को व्यक्त रूप देने मे विफल (‘असफल’ अशुद्ध है।) रहे तब उनका प्रणय-पंछी एक ऐसी दिशा मे उड़ने के लिए पंख पसार चुका था, जिसका लौट पाना लगभग सम्भव नहीँ था तब डॉ० धर्मवीर भारती इलाहाबाद को हमेशा के लिए त्यागकर बम्बई चले जाने का परिपक्व विचार बना चुके थे। उन्होँने ४ सितम्बर, १९९७ ई० को बम्बई मे मृत्यु की गोद मे जाने से पहले ‘चन्दर और सुधा’ की अमर प्रेम-कहानी मे इलाहाबाद की सड़कोँ, गलियोँ, मौसम और बौद्धिक वातावरण मे जिस भावप्रवणता का ताना-बाना बुना है और जो मर्मस्पर्शी-हृदयहारी वितान ताना है, वह उनका जिया और भोगा हुआ यथार्थ है, जिसे वे अन्तत:, ‘गुनाहों का देवता’ के माध्यम से व्यक्त कर देते हैँ :–
“अगर पुराने जमाने की नगर-देवता की कल्पनाएँ आज भी मान्य होतीं, तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर-देवता जरूर कोई रोमांटिक कलाकार है।”
रही बात उनके प्रतिष्ठित उपन्यास ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ की, तो वह भी इलाहाबाद के मुहल्ले अतरसुइया और जिन अन्य मुहल्ले के परिवार वा वातावरण के साथ डॉ० भारती का सरोकार था, वहाँ के निम्न और मध्यमवर्गीय परिवार के आर्थिक-सामाजिक संकट और संत्रास को, उन्होँने जिस रूप मे साक्षी दिया था, उसका प्रभाव है। यह वही उपन्यास है, जिसको लेकर प्रख्यात सिने-निर्देशक श्याम बेनेगल ने ‘विजेता’ फ़िल्म का निर्माण किया था। उसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।
डॉ० धर्मवीर भारती को इलाहाबाद ने सम्पादनकला मे इतना दक्ष कर लिया था कि वे अपने अविस्मरणीय स्मृतिवातायन को अपने साथ लेकर बम्बई के लिए ऐसा प्रस्थान किये कि फिर कभी लौट नहीँ पाये। फिर हो भी क्योँ न, ‘चन्दर’ की ‘सुधा’ उससे हमेशा के लिए बिछुड़ जो चुकी थी; ऐसे मे, स्मृति को बाहुपाश मे आबद्ध किये जीने की राह ‘बम्बई’ मे ही दिखी थी। वहाँ वे ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’-समूह की चर्चित पत्रिका ‘धर्मयुग’ से आ जुड़े, जिसने उन्हेँ एक अलग ही प्रकार की ऊँचाई दी थी; क्योँकि उस अति लोकप्रिय पत्रिका मे वर्ष १९६० से १९८७ तक प्रधान सम्पादक के रूप मे अपने सम्पादन-कौशल का लोहा मनवाते रहना, कोई हस्तामलक नहीँ होता।
ऐसा प्रतीत होता है, मानो ‘धर्मयुग’ के पत्रकारीय वटवृक्ष पर उनके प्राणपखेरू ने अपना नीड़ बना लिया था; क्योँकि ‘धर्मयुग’ से सेवानिवृत्ति के पश्चात् उनकी क्रियाशीलता अव्यवस्थित और असंतुलित रहने लगी; तन-मन का एकान्त विचलित करने लगा और एक समय ऐसा आया, जब वे हृदयरोग की पकड़ और जकड़ के वशीभूत हो गये। उपचार भी कारगर नहीँ रहा। वह जकड़न इतनी निर्मम थी कि डॉ० धर्मवीर भारती को उसका भान तक नहीँ हुआ और निद्रालोक मे ही व्याकुल शरीर ने भी उनसे सदा के लिए मुख मोड़ लिया था; परन्तु ‘गुनाहों का देवता’ आज भी जीवित है, अपने जाने-अनजाने गुनाह को साक्षी देते हुए, सात्त्विक प्रणय-संसार एवं ‘चन्दर’ और ‘सुधा’ से जुड़े मनुहारी स्मृति-लोक मे।
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