सरलता, नम्रता और कृषक भारत की प्रतिमूर्ति देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद की जयन्ती पर नमन

डॉ० निर्मल पाण्डेय (लेखक/इतिहासकार/इतिहास-व्याख्याता)

डॉ• निर्मल पाण्डेय

‘संयुक्त प्रान्त में कोई जगह अमोढ़ा नाम की है। सुनते हैं कि वहाँ कायस्थों की अच्छी बस्ती है। बहुत दिन बीते, वहाँ से एक परिवार निकालकर पूरब चला गया और बलिया में जाकर बसा। एक बड़े ज़माने तक बलिया में रहने के बाद उस परिवार की एक शाखा उत्तर की ओर गयी और आजकल सारण (बिहार) के एक गाँव जीरादेई में जाकर रहने लगी। दूसरी शाखा गया में जाकर बस गयी। जीरादेई-शाखा के कुछ लोग वहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक दूसरे गाँव में भी जाकर बस गए। जीरादेई वाला परिवार ही मेरे पूर्वजों का परिवार है।’

अपनी आत्मकथा में इतिहास में अपनी जड़ें तलाशते हुए राजेन्द्र प्रसाद सात-आठ पीढ़ी पहले जीरादेई आ बसे अपने पूर्वजों का इतिहास बताते हुए ये लिखते हैं।

साहित्य-संसार, पटना से प्रकाशित देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा के प्राक्कथन में सरदार बल्लभ भाई पटेल बताते हैं कि कैसे वह 1918 में खेड़ा सत्याग्रह के दौरान राजेन्द्र बाबू से पहली बार मिले। पटेल यह स्वीकारते हैं कि, ‘ उसी समय से राजेन्द्र बाबू के प्रति मेरे दिल में जो आकर्षण उत्पन्न हुआ, हम दोनो के बीच जो प्रेम की डोर जो जुड़ी, उसके मूल में राजेन्द्र बाबू की सरलता और नम्रता थी, जिसका प्रतिबिम्बन आपको आत्मकथा के पन्ने पन्ने पर मिलेगा।’

राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा के शुरुआती हिस्से उनके बचपन, तत्कालीन बिहार के सामाजिक रीति-रिवाजों, संकुचित एवं रूढ़िवादी प्रथाओं से होने वाली हानियों, तत्कालीन ग्राम्य जीवन, धार्मिक संस्कारों, उत्सवों और त्यौहारों का, तत्कालीन शिक्षा की स्थिति का आँखों देखा हाल बयाँ करती है।

यह सच है कि 1905 के बंगभंग आंदोलन से ही युवा राजेन्द्र प्रसाद पर देशभक्ति का रंग चढ़ने लगा था। यह रंग आने वाले समय में और भी गाढ़ा होता चला गया। 1917 में शुरू हुए चंपारण सत्याग्रह के दौरान उन्होंने गांधीजी की लीक पकड़कर चलने का निर्णय लिया। उसके बाद तो उनका व्यक्तिगत जीवन जाता रहा। 1917 के बाद से उनकी आत्मकथा भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के आगामी तीस वर्षों के सार्वजनिक जीवन का प्रामाणिक इतिहास बनती चली जाती है।

सरलता, नम्रता और कृषक भारत की छवि धारण करने वाले उन्हीं देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद की आज जन्मजयंती है। सादर नमन।