● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
नीचे मध्यप्रदेश-सरकार की ओर से ‘मेडिकल साइंस’ (चिकित्साविज्ञान) के अध्ययन करनेवाले विद्यार्थियों के लिए एक अनूदित (अँगरेज़ी से हिन्दी-अनुवाद) पुस्तक के ‘लंग्स’ (फेफड़े/फेफड़ों) नामक अध्याय की सामग्री है। इसमे केवल ‘क्रिया-परिवर्त्तन’ और ‘का’, ‘की’, ‘मे’, ‘से’, ‘जिसका’, ‘उसका’ आदिक के प्रयोग दिख रहे हैं; शेष मे कोई बदलाव नहीं, जबकि वे अभारतीय शब्द ज्यों-के-त्यों प्रयुक्त किये गये हैं, जिनकी हिन्दी बतानी चाहिए थी। यह अनुवाद के नाम पर केवल ‘हिंग्लिश’ के प्रचार-प्रसार का उपक्रम है।
नीचे अनुवाद के नाम पर जो भी दिख रहा है, वह ‘ट्रांस-जेण्डर’/’थर्ड जेण्डर’ (तृतीय लिंग) की तरह ‘ट्रांस-लैंग्विज़’ के अलावा और कुछ नहीं है।

यह अँगरेज़ी से हिन्दी का अनुवाद न होकर, घातक ‘शैक्षिक संदूषण’ के प्रसार करने का घिनौना शासकीय उपक्रम है। यहाँ जितने भी अभारतीय शब्द दिख रहे हैं, उनमे से अधिकतर की युक्तियुक्त हिन्दी पहले से ही प्रचलित है। आश्चर्य है! इस अध्याय और पुस्तक के अनुवादक/का अनुवादक के मस्तिष्क मे ऐसे कुकृत्य का बीजारोपण कैसे हो गया था। इस बीभत्स (‘वीभत्स’ अशुद्ध है।) कृत्य की जितनी भी भर्त्सना की जाये, अत्यल्प है।
इस अध्याय की रोचक शैली मे उत्कृष्ट भावानुवाद किया जा सकता था, जिससे चिकित्साविज्ञान के विद्यार्थी रुचिपूर्वक अध्ययन कर सकते थे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)