सहायक शिक्षक भरती-प्रकरण पर उत्तरप्रदेश-शासन के आदेश का औचित्य?

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

६९ हज़ार सहायक शिक्षक भरती-प्रकरण पर जब उच्चतम न्यायालय ने अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है तब उत्तरप्रदेश-शासन ने किस आधार पर ३१, ६६१ अभ्यर्थियों को नियुक्त करने का शासनादेश जारी किया है? क्या यह ‘न्यायालय की अवमानना’ नहीं है? जब तक उच्चतम न्यायालय की ओर से उक्त प्रकरण में कोई निर्णय नहीं सुनाया जाता है तब तक उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ का शासनादेश ‘एक अपराध’ की कोटि के अन्तर्गत आयेगा। ऐसे में, सहज प्रश्न है, जब केन्द्र और राज्य की चुनी हुईं सरकारें अपनी निरंकुशता का परिचय दे रही हों तब न्यायपालिका का मौन रहना उसके अस्तित्व के लिए घातक है। उच्चतम न्यायालय को चाहिए कि उत्तरप्रदेश-शासन के उक्त अवैध शासनादेश का संज्ञान कर सम्बन्धित मुख्यमन्त्री के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही करे, ताकि उन्हें अपने असंवैधानिक कृत्य करने का अनुभव हो सके और अन्य सरकारों को भी एक सीख मिल सके, अन्यथा उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ का यह आपराधिक कृत्य और राज्य के मुख्यमन्त्रियों के लिए ‘न्यायालय का अनादर’ करने के लिए एक ‘प्रमाणपत्र’ न बन जाये।

उक्त शासनादेश के पीछे उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री की मंशा को समझने की आवश्यकता है। उनकी सुस्पष्ट मंशा है कि आनन-फानन में ३१, ६६१ अभ्यर्थियों की नियुक्ति कर बड़ी संख्या में की जानेवाली नियुक्तियों से उन्हें मुक्ति मिल जाये और आगे चलकर, वे शेष की नियुक्तियों को भूल जायें। प्रश्न है, पिछले महीनों में जब उच्चतम न्यायालय ने उत्तरप्रदेश-शासन के मुख्यमन्त्री को अभ्यर्थियों को नियुक्त करने को कहा था तब वे चुप्पी साधे रहे; क्योंकि तब उन्हें बड़ी संख्या में नियुक्तियाँ करनी पड़त़ीं।

शिक्षामित्रों का तर्क अविवेकपूर्ण दिखता है। उच्च न्यायालय ने ६५-६० के ‘कट्-ऑफ’ का निर्णय किया था, जो कि उचित है; क्योंकि किसी भी स्तर के शिक्षालय में योग्य अभ्यर्थियों की ही नियुक्ति की जानी चाहिए। इसके विपरीत, शिक्षामित्र ४५-४० के ‘कट्-ऑफ’ की माँग करते हुए उच्चतम न्यायालय पहुँच गये। शिक्षामित्र का पक्ष योग्यता को ताक पर रखकर शिक्षामित्रों की नियुक्तियाँ कराना चाहता है, जबकि उच्चतम न्यायालय भी योग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति का पक्षधर दिख रहा है। हमें उम्मीद है, अक्तूबर-माह में उच्चतम न्यायालय की ओर से जो निर्णय सार्वजनिक किया जायेगा, उसमें योग्यतर अभ्यर्थियों को ही प्राथमिकता दी जायेगी, जो शिक्षाजगत् के हित में रहेगा। शिक्षामित्र निम्नस्तरीय आधार पर नियुक्तियाँ चाहता है, जिसके लिए वह न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर चुका है। ऐसे में, प्रश्न है, मेधावी-सूची के स्तर को बिलकुल ही गिराकर नियुक्तियाँ क्यों? वैसी स्थिति में बेहद कमज़ोर शैक्षिक स्तर के अध्यापक नियुक्त होंगे। तो क्या उससे अध्ययन करनेवाले बच्चों का कल्याण होगा? निस्सन्देह, नहीं। उच्चतम न्यायालय को इस पर दृढ़ता के साथ किसी भी शिक्षामित्र अथवा अन्य की भावी याचिका प्रस्तुत करने का मार्ग अवरुद्ध करते हुए, अपना निर्णय करना चाहिए, ताकि न्याय और न्यायालय की प्रतिष्ठा बची रहे और बनी रहे।

बहरहाल, बी०टी०सी०-अभ्यर्थियों का भी पलड़ा हलका नहीं है। उन्होंने २२ सितम्बर को उच्चतम न्यायालय में उत्तरप्रदेश-शासन के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया है कि जब तक शीर्षस्थ न्यायालय का सुरक्षित निर्णय सार्वजनिक नहीं हो जाता तब तक के लिए उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री के शासनादेश पर रोक लगा देनी चाहिए, जो कि न्यायसंगत याचिका है। इस पर भी यदि उच्चतम न्यायालय के सम्बद्ध न्यायाधीशगण उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री के शासनादेश पर रोक नहीं लगाते हैं तो न्यायालय की अवमानना के लिए वे स्वयं दोषी माने जायेंगे, जो भविष्य के लिए एक अवैध न्यायिक प्रथा बन जायेगी।

देखना है, बी०टी०सी० और शिक्षामित्र-अभ्यर्थियों बीच 20-20 मैच-जैसे इस क़ानूनी खेल में जीत किसकी होती है? वैसे निष्पक्ष ढंग से देखा जाये तो शिक्षामित्रों की तुलना में बी०टी०सी०-अभ्यर्थियों का पक्ष प्रत्येक स्तर पर सुदृढ़ दिख रहा है।

शिक्षामित्रों का अपना तर्क है कि शिक्षक भरती (‘भर्ती’ शब्द अशुद्ध है।) की लिखित परीक्षा में लगभग ४५ हज़ार शिक्षामित्रों ने आवेदनपत्र भरे थे, जिनमें से उत्तरमाला के आधार पर ४५-४० के भारांक पर ३७ हज़ार से अधिक उत्तीर्ण हुए हैं, जबकि परीक्षा नियामक प्राधिकारी का कहना है कि ४५-४० के भारांक पर केवल ८,०१८ शिक्षामित्र सफल हुए हैं। ऐसे में, उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री को चाहिए कि वे अपना शासनादेश अविलम्ब वापस लेकर न्यायालय का सम्मान करें और उच्चतम न्यायालय के निर्णय को सुनने के बाद ही सत्यनिष्ठा का परिचय देते हुए, नियुक्ति-प्रक्रियाएँ आरम्भ करने का शासनादेश प्रसारित करें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ सितम्बर, २०२० ईसवी।)