★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देश मे स्वातन्त्र्य संग्राम का अमृत महोत्सव जगह-जगह आयोजित किया जा रहा है; हिन्दी-पत्रकार-पत्रकारिता की बात की जा रही है; अँगरेज़ी-पत्रकारिता की चर्चा-परिचर्चा की जा रही है; मत-सम्मत व्यक्त किये जा रहे हैं; किन्तु अफ़्सोस! (‘अफ़सोस’ अशुद्ध है।) कुछ लोग ‘हिन्दू-मुसलिम’ विभेदीकरण की घृणित मनोवृत्ति के कारण जंगे आज़ादी मे शानदार और जानदार पत्रकारिता करनेवाले शख़्सीयत (‘शख़्सियत’ अशुद्ध है।) को याद करना ‘महापाप’ समझने लगे हैं; देश का पत्रकार-जगत् भी भूल गया।
हमे नहीं भूलना चाहिए कि देश की जंगे आज़ादी मे उर्दू-अख़बारात (‘अख़बारों’ अशुद्ध है।) की बेहद अहम्मीयत (‘अहमियत’ अशुद्ध है।) रही है। लोग हिन्दी-उर्दू के बीच एक ऐसी रेखा खींचते आ रहे हैं, जिससे उनकी जहालत (अज्ञान) सामने आ जाती है, जबकि उर्दू की पत्रकारिता को शिखर तक ले जानेवाले वे शख़्सीयत ‘ज़हीन’ (प्रतिभावान्) थे। हमे इस अस्लीयत (‘असलियत’ अशुद्ध है।) को नहीं भूलना चाहिए कि जब अँगरेज़ों ने दिल्ली पर एक बार फिर से क़ब्ज़ा किया था तब उनकी सबसे पहले क्रूर दृष्टि ‘देहली उर्दू अख़बार’ पर पड़ी थी। ऐसा इसलिए कि जंगे आज़ादी के समय उस ऐतिहासिक अख़बार ने अपना जो किरदार जिया था, वह अविस्मरणीय है। ‘देहली उर्दू अख़बार’ के सम्पादक मौलवी मोहम्मद बाकर ने आज़ादी के दीवानों की भरसक हिमायत की थी। अँगरेज़ उस अख़बार और उसके सम्पादक से इतना ख़ार खाये हुए थे कि सही मौक़ा पाकर उन्होंने देशभक्त पत्रकार मौलवी मोहम्मद बाकिर साहिब को सूली पर चढ़वा दिया था। मौलवी साहिब देश की आज़ादी पर क़ुर्बान कर जानेवाले प्रथम पत्रकार थे।
जंगे आज़ादी मे उर्दू-सहाफ़त (पत्रकारिता) का रोल (भूमिका) बेहद गौरवपूर्ण रहा है। बड़ी संख्या मे उर्दू-पत्रकार देश की आन पर शहीद (बलिदानी) हो गये थे। उनकी शहादत (बलिदान) हम विस्मृत नहीं कर सकते।
जहाँ तक उर्दू-पत्रकारिता की शुरुआत का तअल्लुक़ (‘ताल्लुक’ अशुद्ध है।) है, उसके लिए बंगाल सूबे को हम भूल नहीं सकते। बंगाल ही पत्रकारिता की जन्मभूमि रहा है, जहाँ से हिन्दी, उर्दू तथा अँगरेज़ी-पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी। २७ मार्च, १८२२ ई० को देश के प्रथम उर्दू-समाचारपत्र का उदय हुआ था; और वह भी साप्ताहिक समाचारपत्र के रूप मे। उस समाचारपत्र का नाम ‘जाम ए-जहाँनुमा’ था, जो कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित हुआ था। उसके स्वामी हरिदत्त थे। उन्होंने उस समाचारपत्र के सम्पादन का दायित्व सदासुख लाल को सौंपा था। इस प्रकार २७ मार्च, २०२२ ई० को उर्दू-पत्रकारिता के २०० वर्ष पूर्ण हुए थे।
हमे सभी बोली-भाषाओं का समादर करना होगा; क्योंकि वे ज्ञान के स्रोत हैं। यदि कोई घर और मकान, पुरुष और आदमी, मा और अम्मी, पिता और अब्बा आदि पर दो प्रकार की दृष्टि निक्षेपित करता है तो वह व्यक्ति अपने चरित्र-स्तर पर नितान्त स्खलित रहता है। हमारे लिए माता-पिता, अवश्य, नितान्त, लेखनी का उतना ही महत्त्व है जितना कि अम्मी-अब्बा, ज़रूर, बिलकुल तथा क़लम की अहम्मीयत है। वस्तुत: यही साम्प्रदायिक सद्भाव है।
● लेखक भाषाविज्ञानी और उन्मुक्त विचारक हैं।