— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
चीन की भारत के प्रति जो दुरभिसन्धि थी, वह अब प्रत्यक्ष हो चुकी है। भारत के राज्य सिक्किम की ओर चीन के बढ़ते क़दमों को भारतीय सैनिकों ने ठहर जाने के लिए बाध्य कर दिया था, जिससे मार्ग-निर्माण करने के उद्देश्य में वह विफल हो गया था; प्रतिक्रियास्वरूप भारत के दो बंकरों को नष्ट कर देने में उसने अपनी बहादुरी दिखा दी थी। इससे पूर्व वह लद्दाख में घुसपैठ कर चुका है और २०१६ ई० में चमोली में रेकी भी करा चुका है। चीन के नीचतापूर्ण आचरण का अन्दाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत के राष्ट्रपति ने चीन की सद्भावना- यात्रा की थी और जब स्वदेश लौटे थे तब उसके १५ दिनों के बाद चीन ने भारत की सीमा के सन्निकट आकर भारत-विरोधी गतिविधियाँ संचालित कर दी थीं। चीन ने भारत के राज्य अरुणांचलप्रदेश के कई क्षेत्रों के नाम-परिवर्त्तन भी कर दिये हैं।
सिक्किम-स्थित सीमा पर भारत की सेना से मुँह की खाने के बाद चीन भूटान की ओर रुख़ कर चुका है। वहाँ वह भूटान से लगी सीमा पर ‘डोकाला मार्ग’ पर सड़क बनाने की तैयारी कर रहा था; परन्तु भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को बलपूर्वक धकियाते हुए, बाहर का रास्ता दिखा दिया था, जिससे आगबबूला होकर ‘डोकाला मार्ग’ पर उसने तीन हज़ार सैनिकों को लगा दिया था; वहीं भारत ने भी अतिरिक्त तीन हज़ार सैनिकों को वहाँ तैनात कर दिया था।
स्मरणीय है कि वर्ष १९८८ और १९९८ में यह समझौता किया गया था कि सीमा के पास किसी भी प्रकार का निर्माणकार्य दोनों देशों की सहमति से ही होगा; किन्तु पाकिस्तान की ही तरह चीन भी सन्धि और समझौतों को न मानने की अपनी हेय मानसिकता का आये-दिन प्रदर्शन करता आ रहा है।
चीन की कुत्सित नीति यहीं तक नहीं है, अपितु एक लम्बे समय से वह हिन्दमहासागर में भी अपनी अवैध उपस्थित अंकित कराता आ रहा है। वहाँ उसकी पनडुब्बियाँ और १३ युद्धपोत हिन्दमहासागर के चक्कर लगा रहे हैं। वर्ष २०१७ में वह तिब्बत के पठार के पास अपने टैंक का परीक्षण कर चुका था। ‘क्लास ४०’ क्षेत्र में नेपाल के साथ मिलकर वह सड़क बनाने में लग गया है।
दूसरी ओर, एक अलग प्रकार का सैन्य-समीकरण बनता नज़र आ रहा है, जहाँ चीन की एकल प्रभुता को संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से स्पष्ट चुनौती मिल रही है, कारण कि जिस दक्षिणी चीनसागर पर चीन अपना स्वामित्व मानता है, वहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने युद्धपोत उतार दिये हैं। ज्ञातव्य है कि एक अरसे से चीन दक्षिणी चीनसागर को अपना ही मानता आ रहा है; किन्तु वैधानिक रूप में उस पर सभी देशों का समान अधिकार है।
पहली बात तो भारत-चीन का युद्ध होगा नहीं; परन्तु चीन की अतिरिक्त हठधर्मिता के कारण दोनों देशों के मध्य युद्ध यदि होता है तो भारत के साथ उसके सहयोगी मित्र वियतनाम, जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा संयुक्त राज्य अमेरिका हैं; दूसरी बात, सामरिक दृष्टि से आज का भारत थल, जल तथा नभस्तरों पर अतीव समृद्ध और सम्पन्न है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ जुलाई, २०२० ईसवी)