हम क्यों, किसके लिए तथा क्या लिख रहे हैं?– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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प्रत्येक वर्ष की भाँति माघमेला-आरम्भ होने से पूर्व ‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ की ओर से संगमतट के समीप-स्थित ‘संगम नागरिक पाण्डाल’ (शुद्ध शब्द ‘पाण्डाल’ है।) मे आज (२५ दिसम्बर) भाषाविज्ञानी और समालोचक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की अध्यक्षता मे दो सत्रों मे ‘प्रकृति से पराप्रकृति की ओर’ समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें प्रयागराज और बाहर से आये प्रबुद्धवृन्द की भागीदारी रही। आरम्भ मे अध्यक्ष ने दीप-प्रज्वलन कर महोत्सव का उद्घाटन किया। मुख्य अतिथि शाइर तलब जौनपुरी, सारस्वत अतिथि आकाशवाणी, प्रयागराज के निदेशक लोकेश शुक्ल तथा विशिष्ट अतिथि कवि मुकुल मतवाला ने सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण किया। संस्था के अध्यक्ष और संयोजक डॉ० प्रदीप चित्राशी ने अभ्यागतों का स्वागत करते हुए, संस्था की गतिविधियों से अवगत कराया।प्रथम सत्र मे साहित्य के क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान के लिए क्रमश: विजय चित्तौरी को ‘साहित्यश्री’ सम्मान और रामलखन प्रतापगढ़ी को ‘काव्यकीर्ति’ सम्मान से आभूषित किया गया। इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मे आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “हम प्राय: देखते हैं कि कवि, साहित्यकार तथा लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित हो जाती हैं; परन्तु वे उन्हीं तक सिमट कर रह जाती हैं। ऐसा इसलिए कि वे उद्देश्यरहित होती हैं। हम क्यों, किसके लिए तथा क्या लिख रहे हैं, यह दृष्टिबोध रहना चाहिए।”
द्वितीय सत्र मे कविसम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमे तलब जौनपुरी की ग़ज़ल का एक शे’र था– महफ़िल मे उतरती है आसमा को चीरकर, बिजली-सी कौंधती है तलब जी की शाइरी।
लोकेश शुक्ल ने सुनाया– झूठे क़िस्से हज़ारों गढ़े जाये हैं, तेरे-मेरे के झगड़े बढ़े जाये हैं।
डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने दोहा सुनाया– कथरी कहती पूस से करो न हमको तंग, मानवीय सम्बन्ध का देखो आकर ढंग।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की ग़ज़ल का एक शे’र था– घड़ियाली आँसू अब न बहाइए हुजूर। मन मे हमारे क्या है अब सुनाइए हुजूर।
अभिषेक केसरवानी ने सुनाया– गंगे! जगत् की मइया, युग-युग से बह रही हो। हर एक युग की गाथा, कल-कल मे कह रही हो।
एस० पी० श्रीवास्तव ने सुनाया– तुला बराबर चाहिए, तब होता इंसाफ़।
अनिल शलभ ने सुनाया– मै शलभ हूँ मौत से डरता नहीं, प्यार का संदेश देने चल पड़ा हूँ।
रामकैलाश प्रयागी ने अटलबिहारी वाजपेयी की स्मृति मे पढ़ा– राजनीति के गलियारे मे कभी नहीं वे विफल रहे, ज़मी और आकाश जोड़कर संसद् तक वे सफल रहे।
मीरा सिन्हा नये वर्ष का स्वागत करते दिखीं– नववर्ष! तुम्हारे आने पर गीत हम कैसे गायें, मन मे फुफकार रही है नाना आशंकाएँ।
मुकुल मतवाला ने सुनाया– ज़िन्दगी यह नहीं कितने बरस जिया जाये, ज़िन्दगी यह नहीं कि कितना खाया-पिया जाये।
जयशंकर मिश्र ने सुनाया– मा गंगा! तू पावन है, रूप तेरा मनभावन है।
केशव सक्सेना ने सुनाया– हम सब धन-दौलत मे आगे, पर वे प्रेमसुख नहीं पाते।
डॉ० वीरेन्द्र तिवारी ने गीत पढ़ा– गंगा मइया! टूटे नहिं गंगा मइया! तुझसे ये नाता टूटे ना।
रामलखन प्रतापगढ़ी ने गीत सुनाया– तोहरी गोदिया मे हम आहि रहब, हम लाल तोहार कहावत बाँटी।
महोत्सव के अन्त मे गंगानदी के किनारे समस्त सारस्वत अतिथियों ने मा गंगा की आरती उतारी। इस आयोजन का प्रबन्धन गुड्डू पण्डा ने किया। विशेष सहयोग ज्योति चित्रांशी का रहा। सुनील मिश्र की भी विशेष उपस्थिति रही। इसी अवसर पर महामना मदनमोहन मालवीय और अटलबिहारी वाजपेयी के गंगा के प्रति किये गये कर्मों का स्मरण करते हुए, उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी। महोत्सव के संयोजक डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कृतज्ञता-ज्ञापन किया।