आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

प्रथम शिक्षा

एक सुशिक्षित व्यक्ति वह होता है जिसकी कल्पनाशक्ति तीव्र, हृदय सहानुभूतिपूर्ण तथा बुद्धि अनुशासित हो। उसे यह शीघ्र सम्बोध हो जाना चाहिए कि कोई वस्तु अन्य जन के दृष्टिकोण से कैसी दिखती है; क्योँकि उस व्यक्ति जितना मूर्ख कोई नहीँ होता, जो वस्तु को एक ही कोण से देखने का अभ्यासी है।

द्वितीय शिक्षा

यह बात आपके मन-मस्तिष्क मे बैठ और पैठ जानी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति दो प्रकार की शिक्षा ग्रहण करता है :– पहली– जो दूसरोँ से प्राप्त होती है और दूसरी– जो वह स्वयं को देता है; अर्थात् स्वयं के उद्योग से अर्जित (स्वत: अर्जित)।

तृतीय शिक्षा

शिक्षा में तीन पौष्टिक तत्त्व होते हैँ :– पहला– अध्ययन के प्रति अभिरुचि; दूसरा– अध्ययन-विधि तथा तीसरा– यह अनुचिन्तन कि अध्ययन ही पर्याप्त नहीँ।

चतुर्थ और अन्तिम शिक्षा

शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य शब्दोँ के सर्वोच्च अर्थ मे, महिला और पुरुष का नैतिक विकास है। शिक्षा की वास्तविक सफलता के लिए, इसका अन्तिम परिणाम ऐसे महिला और पुरुष होने चाहिए, जिन्होँने ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ, चारित्रिक विकास भी किया हो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ सितम्बर, २०२६ ईसवी।)