आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

अब हमें देवनागरी लिपि के अन्तर्गत हिन्दीभाषा मे प्रयुक्त किये जानेवाले उन शब्दों पर विचार करना होगा, जो लुप्तप्राय हो चुके हैं तथा जो यदा-कदा व्यवहार मे लक्षित होते रहते हैं; और वह भी अशुद्धि-रूप मे। हम यदि उन शब्दों के प्रति चिन्तित नहीं होंगे तो वे शब्द हमारी मुट्ठी से बालू की भाँति फिसलते जायेंगे। उन शब्दों मे तत्सम, अर्द्ध-तत्सम, तद्भव, स्थानिक तथा अभारतीय भी हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए― महत्त्व, पश्चात्ताप, प्रायश्चित्त, तत्त्व, कर्त्ता, बीभत्स, बृहद्, वार्त्ता, परिवर्त्तन, संगृहीत, अनुगृहीत, स्रष्टा, द्रष्टा, सान्निध्य, सर्जन, शख़्सीयत, नीदरलैण्ड्स, फ़ित्रत, दरअस्ल, अस्ली-नक़्ली, बिलकुल, रंगविरंगा/रंग-विरंगा, प्रविधान, शुश्रूषा, देदीप्यमान, प्रज्वलित, रंग, रँग, रँगना, बीजवपन/बीज-वपन पुन: प्रकाशित, अन्तर्द्धान, नयन, हतोत्साह, कर्त्तृत्व आदिक।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ जनवरी, २०२४ ईसवी।)