आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

♀ हमे ‘इस पाठशाला’ से पूर्व ऐसा कोई भी स्रोत प्राप्त नहीं हुआ था, जिसमे किसी भी प्रकार के अशुद्ध-शुद्ध वाक्य को इतने विस्तार के साथ समझाते हुए, लेखन हुआ हो और समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन किया जाता रहा हो।

निर्देश― अधोटंकित वाक्य को सकारण (कारणसहित/कारण-सहित/कारण के साथ/कारणपूर्वक) शुद्ध करें―

हवाऐं सुन्दर बह रहे हैं।

सकारण उत्तर―
यह पूर्णत: अशुद्ध वाक्य है। काल के विचार से यह वाक्य वर्तमान/वर्त्तमान अपूर्ण काल का उदाहरण है। वाक्य-भेद की दृष्टि से यह सकारात्मक वाक्य है और साधारण वाक्य भी। हमारे जो विद्यार्थी दिये गये अशुद्ध वाक्य को शुद्ध करते समय उसके ‘काल’ मे परिवर्त्तन करते हैं, वे बहुत बड़ी भूल करते हैं; क्योंकि उसके ‘काल’ को बनाये रखते हुए ही वाक्य-संशोधन किया जाता है।

अब हम वाक्य के कर्त्ताशब्द/कर्त्ता-शब्द/कर्त्ता के शब्द (षष्ठी तत्पुरुष समास; सम्बन्धबोधक कारक) पर विचार करते हैं। इस वाक्य मे ‘हवाऐं’ कर्त्ता-शब्द है और संज्ञा भी। इस ‘हवाऐं’ की वर्तनी (अक्षरी) मे ‘ऐं’ का प्रयोग अशुद्ध है; यदि यह ‘एं’ होता तो भी अशुद्ध कहलाता; क्योंकि ‘ए’ मे अनुस्वार (नासिका-द्वारा उच्चरित/उच्चारित; बिन्दी) के स्थान पर अनुनासिक (मुख और गले के द्वारा उच्चरित/उच्चारित; चन्द्रबिन्दु) का व्यवहार किया जायेगा। इस ‘एँ’ का उच्चारण अत्यन्त ‘विनम्र’ प्रवाह मे (‘में’ अशुद्ध है; क्योंकि पवर्ग का पंचमाक्षर ‘म’ होता है, जो अनुस्वारयुक्त) होता है― ‘हवाएँ’।

प्राय: ‘हवा’ का बहुवचन ‘हवाएँ’ और ‘हवाओं’ का व्यवहार किया जाता रहा है, जो कि पूर्णत: अशुद्ध है; क्योंकि ‘हवा’ एकवचन के रूप मे प्रयुक्त होता है और बहुवचन के रूप मे भी। हवा एक राशि है; समूह है और इस प्रकार के समूह का कभी विखण्डन नहीं होता। इसे समझने के लिए कतिपय प्रासंगिक उदाहरणो (‘उदाहरणों’ अशुद्ध है; क्योंकि ‘ण’ टवर्ग का पञ्चमाक्षर/पंचमाक्षर/पाँचवाँ है। (पांचवा, पांचवां पाँचवा तथा पाँचवां अशुद्ध हैं।) को देखें, पढ़ें तथा समझें :― वायु, जल, प्रकाश, प्राण, रस, बल इत्यादिक। हम इन शब्दों को क्रमश: वायुएँ-वायुओं, जलें-जलों, प्रकाशें-प्रकाशों, प्राणें-प्राणों, रसें-रसों, बलें-बलों के रूप मे प्रयोग नहीं कर सकते।

इसप्रकार हमारा प्रथम शुद्ध शब्द ‘हवा’ है। ‘हवा’ को बहुसंख्य जन बोलते (अविचारित), कहते (विचारित) तथा लिखते (सुविचारित) हैं; परन्तु यह नहीं जानते कि ‘हवा’ किस भाषा का शब्द है। उनसे प्रश्न करने पर उत्तर प्राप्त होगा― ‘हिन्दी’ का भाषा है। वास्तव मे, ‘हवा’ अरबी-भाषा का शब्द है। यह ‘संज्ञाशब्द’/’संज्ञा-शब्द’/’संज्ञा का शब्द’ है। (‘संज्ञा शब्द’ अशुद्ध है; क्योंकि ‘अर्थ’ की दृष्टि से यह न तो समास है और न ही विग्रह।) यहाँ ‘हवा’ का अर्थ वायु, वात, समीर इत्यादिक है। ‘हवा’ के लिए भिन्नार्थक शब्द भी हैं; जैसे― आकांक्षा; लोभ; धाक।

‘हवा’ के आगे का शब्द ‘सुन्दर’ है। शब्दभेद के विचार से यह ‘विशेषण-शब्द’ है। इस ‘सुन्दर’ शब्द की वर्तनी (अक्षरी) शुद्ध है।

लिखने की रीति को वर्तनी कहते हैं, जो लिपि-चिह्नो के रूप और उनके संयोजन को निर्धारित करती है। वर्तनी के अन्तर्गत लेख-नियम, अक्षर, अक्षर-विन्यास, मात्रा, वर्ण-विन्यास आदिक आते हैं।

‘सुन्दर’ शब्द संस्कृत/सम्सकृतभाषा/सम्सकृत-भाषा (यहाँ ‘संस्कृत भाषा’ का प्रयोग अशुद्ध है; क्योंकि यह न तो समास है और न ही विग्रह।) से उत्पन्न है। सुन्दर की परिभाषा है― जो गठन, रूप-रंग आदिक की दृष्टि से देखने मे सुखद लगे, वह ‘सुन्दर’ है। अब यहाँ प्रश्न है, क्या हवा का गठन, रूप-रंग है? उत्तर है― नहीं। इसप्रकार ‘हवा’ सुन्दर’ हो ही नहीं सकती और न ही इसका प्रभाव ‘सुन्दर’ हो सकता है। ‘हवा’ का संस्पर्श सुखकर/सुखप्रद/सुखद, मनोहर/मोहक हो सकता है। यहाँ पर हवा न तो शीतल होगी और न ही तप्त। ऐसा इसलिए कि ‘हवा’ (विशेष्य/संज्ञा) के साथ ‘सुन्दर’ विशेषण का प्रयोग किया गया है। ऐसे मे, यहाँ हमारा विशेषण भी उसी स्वभाव के अनुरूप होगा। यहाँ ‘हवा’ के लिए सर्वाधिक उपयुक्त विशेषण सुखदा/सुखदायिनी, सुखकारी/सुख देनेवाली है; क्योंकि इसमे सभी समानार्थी भाव निहित हैं और विशेष्य-शब्द ‘हवा’ स्त्रीलिंग का शब्द है, अत: इसका विशेषण भी स्त्रीलिंग (सुखदा/सुखदायिनी) होगा। अब हमे विचार करना है― क्या ‘हवा सुखदा’ शुद्ध है वा (अथवा) ‘सुखदा हवा’? उत्तर है― ‘सुखदा हवा’ (सुखदायिनी हवा)।

अभी तक शुद्ध किये गये शब्द-प्रयोग को आगे बढ़ाते हैं।
हमारा वाक्य है― ‘सुखदा (सुखदायिनी) हवा बह रहे हैं।’
हमे अब इस वाक्य की ‘क्रिया’ पर विचार करना है। हमारी क्रिया है― ‘बह रहे हैं।’ ‘सुखदा हवा’ एकवचन का कर्त्ता-शब्द है, इसलिए क्रिया ‘बह रही है’ होगी।
यहाँ ‘हवा’ के साथ ‘बहना’ क्रियाशब्द-प्रयोग के औचित्य को समझना होगा।

हिन्दी के व्याकरणिक नियम के प्रक्रियान्तर्गत (‘की प्रक्रियान्तर्गत’ अशुद्ध है; क्योंकि ‘प्रक्रिया’ के आगे का अन्तिम वाक्य ‘अन्तर्गत’ पुंल्लिंग-शब्द है।) लिंगानुसार ही क्रिया मे परिवर्त्तन/परिवर्तन होता है।

ज्ञातव्य (जाननेयोग्य/जानने-योग्य/जानने के योग्य) है कि ‘हवा’ ऐसा तत्त्व (‘तत्व’ अशुद्ध है; क्योंकि तत्+त्व के योग का परिणाम ‘तत्त्व’ है।) है, जो पृथ्वी (‘सम्पूर्ण पृथ्वी’ का प्रयोग अशुद्ध है और अनुपयुक्त भी; क्योंकि ‘पृथ्वी’ अपने आकार मे कहीं पर भी विभाजित नहीं है।) पर व्याप्त है। ‘हवा’ चलते रहनेवाला तत्त्व है, इसलिए ‘हवा’ ‘चलती है’, ‘बहती’ नहीं। ‘बहना’ का प्रयोग ‘जलीय-तैलीय’ पदार्थ के साथ प्रयुक्त होता है।

उपर्युक्त समस्त व्याकरणिक प्रक्रियाओं को सम्पन्न करने के अनन्तर हमे अन्तत:, शुद्ध और उपयुक्त वाक्य प्राप्त होता है―

■ सुखदा (सुखदायिनी) हवा चल रही है।

◆ आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला नामक प्रकाशनाधीन पुस्तक से सकृतज्ञता (साभार) गृहीत (ग्रहण/लिया/ किया गया।)

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ जनवरी, २०२३ ईसवी।)
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