★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय—
● रूसी सेना ने युक्रेन के ‘बूचा’ मे मानवता का मर्दन करते हुए, अपने नृशंस चरित्र का परिचय दिया है।
● युक्रेन के बूचा मे युक्रेनी युवतियों के साथ रूसी सैनिकों ने बलपूर्वक शारीरिक दुष्कर्म किये हैं; बच्चों की निर्मम हत्या की है तथा बड़ी संख्या मे बन्धक बनाये हैं।
● युक्रेनी सेना ने रूसी सेना-द्वारा बन्धक बनाये गये जिन ४१० नागरिकों को उनसे (रूसी सेना से) वापस लिये थे, उन सभी को रूसी सैनिकों ने आग मे जलाकर मार डाला है।
● रूसी सैनिक बच्चियों और अन्य महिलाओं का अपहरण कर यातनाएँ दे रहे हैं।
● बूचा मे रूसी सैनिकों ने सामूहिक नरसंहार किये हैं।
● रूसी सैनिकों ने चिकित्सालयों, बाज़ारों, शिक्षणसंस्थानों, रेडक्रॉस के वाहनों को ध्वस्त कर दिये हैं तथा लगभग २० मीडियाकर्मियों की हत्या की है।
● रूसी सेना ने प्रतिबन्धित ‘क्लस्टर बम’ गिराकर युक्रेन मे भीषण तबाही की है।
आश्चर्य है, भारत-सहित लगभग सभी देश चूड़ियाँ पहनकर घर मे बैठे हुए हैं; विरोध करने की शक्ति ‘नपुंसक’ बन चुकी है। ऐसे निर्मम, निर्दय तथा निकृष्ट मनोवृत्तिवाले पुतीन को समझाने और अपना पक्ष प्रस्तुत करने मे ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ नाकाम रही है, जबकि रूस का विदेशी कार्य सँभालनेवाला व्यक्ति हाल ही मे भारत आया था। नपुंसकों का सरदार संयुक्त राज्य अमेरिका का निकम्मा राष्ट्रपति जो बाइडेन है, जो सिर्फ़ शब्दों मे सहायता देता आ रहा है; अपने हथियार बेचने का गणित लगा रहा है।
अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् को भंग कर देने की आवश्यकता है, जो इतना सब घट जाने के बाद भी अभी तक निष्क्रिय बना हुआ है।
अब युक्रेन को चाहिए कि अपने यहाँ से सीधे रूसी क्षेत्रों मे अति ख़तरनाक शस्त्रास्त्रों से भीषण हमला करे और अपनी प्रतिहिंसा की छिपी मनोवृत्ति को व्यावहारिक रूप दे। युक्रेन का तो अब विध्वंस हो ही चुका है, इसलिए प्रत्येक स्तर पर युद्धनिषेधक नीतियों पर पदप्रहार करते हुए, चुन-चुनकर बदला ले, जिससे कि आचरणहीन पुतीन के देश मे ही उसके विरुद्ध विरोध के सामूहिक स्वर उभरे। सभी देश अब रूस को ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्’ की सदस्यता से बाहर कराने की योजना पर तत्परतापूर्वक शीघ्रातिशीघ्र अमल करायें। युक्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर ज़ेलेंस्की ने आज (५ अप्रैल) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् मे अपनी व्यथा को प्रस्तुत करते हुए, कथित सुरक्षा परिषद् की कार्यप्रणाली के सम्मुख प्रश्नो के अम्बार लगा दिये हैं।
यदि रूसी समर्थक देशों को छोड़कर शेष देशों ने वैश्विक एकता का परिचय देते हुए, आतंकवादी, तानाशाह पुतीन के विरुद्ध मोर्चा नहीं खोला तो पुतीन की अतिवादिता कितना विस्तार पा जायेगी, समझा जा सकता है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)