● आज (२४ दिसम्बर) व्याकरणाचार्य पं० कामता प्रसाद गुरु की १४६ वीं जन्मतिथि है।

व्याकरणाचार्य पं० कामता प्रसाद गुरु की एक सौ छियालीसवीं जन्मतिथि के अवसर पर ‘सर्जनपीठ’ प्रयागराज की ओर से २४ दिसम्बर को प्रयागराज से एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय व्याकरणिक परिसंवाद-आयोजन किया गया, जिसमें देश के अनेक भाषाशास्त्रियों की सहभागिता रही।

प्रख्यात व्याकरणाचार्य प्रो० रहसबिहारी द्विवेदी ने जबलपुर से अपना मत व्यक्त किया, “हिन्दी-भाषा के लेखन और भाषण के लिए उचित प्रकृति, प्रत्ययों तथा विभक्तियों (सम्बन्धतत्त्वों) के स्थिरीकरण की दृष्टि से पण्डित कामता प्रसाद गुरु का अविस्मरणीय योगदान है। वे “गुरुणां गुरु:” के रूप में आज भी वन्दनीय हैं।”

भारतीय विद्याभवन, प्रयागराज के निदेशक डॉ० रामनरेश त्रिपाठी ने कहा, “स्वनामधन्य व्याकरणाचार्य कामता प्रसाद गुरु ने १९२० ई० में इलाहाबाद से नाता जोड़ा था और इंडियन प्रेस से प्रकाशित बाल सखा और सरस्वती के प्रकाशन में अद्भुत योगदान किया था। उन्होंने सरस्वती पत्रिका को व्याकरण से समृद्ध करते हुए हिन्दीभाषा-साहित्य का परिमार्जन किया था। वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने अनेक उपन्यास, खण्डकाव्य का सर्जन किया और ब्रजबोली-सहित अनेक भाषाओं में रचनाकर्म किया। प्रयाग की धरती पर स्वयं को व्याकरणाचार्य के रूप में प्रतिष्ठापित करनेवाले हिन्दीजगत् को देदीप्यमान करनेवाले ‘युगपुरुष’ को हम कोटिश: नमन करते हैं। वे हिन्दी- जगत् के लिए आज भी आदर्श हैं।”

भाषाविद् और समीक्षक, परिसंवाद-संयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (प्रयागराज) ने कहा, “विडम्बना है कि जिस भाषाचार्य पं० कामता प्रसाद गुरु ने शब्दानुशासन की संरक्षा के लिए अपना जीवन दे दिया, वही कृतघ्न समाज अब उन्हें भूल चुका है। यही कारण है कि उच्चस्तरीय शिक्षाजगत् में मौखिक और लिखित भाषाप्रयोग-स्तर पर शोचनीय स्खलन आ चुका है और हमारे ‘जानकारशास्त्री’ मौन बने हुए हैं।”

शासकीय परास्नातक महाविद्यालय, सागर में हिन्दीविभागाध्यक्ष डॉ० घनश्याम भारती ने कहा, “पं० कामता प्रसाद गुरु का वैयाकरण रूप इतना प्रबल था कि वे व्याकरण के पाणिनि कहे जाने लगे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने उन्हें साहित्य वाचस्पति की उपाधि से विभूषित किया था। सागर, मध्यप्रदेश में जन्मे पं० कामता प्रसाद गुरु ने सात वर्षों तक अध्यवसाय करके हिन्दी का प्रथम प्रामाणिक व्याकरण लिखा था। नागरी प्रचारिणी सभा की व्याकरण संशोधन समिति ने उनकी व्याकरण की प्रशंसा की। हिन्दी-व्याकरण के क्षेत्र में उनका नाम विश्वप्रसिद्ध है। उनकी धारणा थी कि भाषा को नियमबद्ध करने के लिए व्याकरण नहीं बनाया जाता, वरन् भाषा पहले बोली जाती है, उसके आधार पर व्याकरण की उत्पत्ति होती है।”

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी-विभाग के प्राध्यापक प्रो० शिवप्रसाद शुक्ल ने बताया,” हिन्दी-व्याकरण को कामता प्रसाद गुरु ने पाणिनि-जैसी स्थिति प्रदान की। किसी भी विवाद की स्थिति में गुरु का व्याकरण प्रमाण का कार्य कर रहा है। हिन्दी को शुद्ध रखने के लिए गुरु का व्याकरण-दिशानिर्देश कर रहा है। हिन्दी या कोई भी भाषा सभ्यता एवं संस्कृति की द्योतक है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान हिन्दी-व्याकरण का जतन कामता प्रसाद गुरु ने किया। उनकी व्याकरण की विरासत को सँभालना हम सब की जबावदारी है।”

वरिष्ठ पत्रकार-विचारक श्री रमाशंकर श्रीवास्तव ने कहा, कामता प्रसाद गुरु ने “शुद्ध लेखन और उच्चारण की कला का ज्ञान व्याकरणशास्त्र के माध्यम से किया था, जबकि इनका व्याकरणसम्मत प्रयोग नहीं किया जा रहा है। आज लेखन में व्याकरण की उपेक्षा करने का चलन ‘विकास’ के नाम पर तेज़ हो गया है। मुखसुख के नाम पर अशुद्ध और अनुपयुक्त शब्दप्रयोग जारी है। मीडिया और अध्ययन-अध्यापन में भी व्याकरण की उपेक्षा की जा रही है, जो चिंता का विषय है।”

मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर में संस्कृत-विभाग में सहायक प्राध्यापक डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय ने कहा,” कामताप्रसाद गुरु जी हिन्दी के वरद् पुत्र रहे हैं। उन्होंने हिन्दी को व्याकरणबद्ध और सुव्यवस्थित करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।उनकी लेखनी ने हिन्दी को पद्य और गद्य से समृद्ध किया था। ‘हिन्दी-व्याकरण’ नामक अपनी कृति से उन्होंने हिन्दी की अभूतपूर्व सेवा की। कामताप्रसाद गुरु जी ने शब्दों में सन्निहित प्रकृति-प्रत्यय की वैज्ञानिक व्याख्या करके, हिन्दी-समाज में शुद्ध हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया था।”